लोकमतवाद : पूंजीवाद से जनतंत्र का रक्षक

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कुछ दिनों से दुनिया भर के राजनीतिक विश्लेषकों में एक शब्द काफी प्रचलित हो रहा है – populism | अगर हिंदी में इस का अनुवाद करें तो सीधा शब्द है लोकमतवाद | ऐसा कोई  वाद मेरी जानकारी में नहीं है पर मैंने पॉपुलिस्म शब्द को सीधा अनुवाद कर के लोकमतवाद रखा है  | मुल्लर (2016 ) ने इस शब्द का बहुत विस्तार में  सैद्धांतिक रूप से वर्णन  किया है पर मैं यहाँ उस सैद्धांतिक विस्तार में नहीं जाना चाहता हूँ.| यहाँ मेरा परिपेक्ष इस शब्द के प्रचलित अवधारणा से है जिस का मतलब है एक राजनीतिक सोच जहाँ शाशन में लोकप्रियता सर्वोपरि हो जाता है और तार्किक और तथ्य आधारित निर्णय गौण हो जाते हैं या कम महत्वपूर्ण रह जाते हैं | 

हाल के कुछ दिनों में हमारे प्रधानमंत्री ने कई लोकप्रिय कार्यक्रमों की घोषणा की है | दरअसल अगर देखें तो पिछले एक महीने में उन्होंने सौ से अधिक कार्यक्रमों का उद्घाटन किया है. | NDTV के अनुमान के अनुसार इन सारे कार्यक्रमों की कुल लागत दो लाख करोड़ से अधिक है | 12 करोड़ लोगों को सालाना 6000 रुपये सीधे उनके बैंक कहते में जमा करवाना, आयकर में छूट, ऋण माफ़ी सब इनके उदहारण हैं | विपक्ष स्वाभाविक रूप से नाराज और परेशान है और सरकारी पैसों से वोट खरीदने का इलज़ाम लगा रही है | 

मैं यहाँ सरकार या विपक्ष के पक्ष या विपक्ष में बात नहीं करना चाहता हूँ | मैं ये जानना चाहता हूँ की ये क्या भारतीय घटना है या दुनिया में सामान्य घटना है और हमारे देश में जो हो रहा है वो कुछ भी अलग नहीं है | साथ इस के ये भी कि ये लोकतंत्र के लिए किस तरह का असर डाल रहे हैं | 

अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का टैक्स रिफार्म कार्यक्रम, ओबामा केयर में सुधार का कार्यक्रम और चाहे अप्रवासी विरोधी बयानबाजी इसी लोकमतवादी मानसिकता का परिचायक है | फिलीपींस के दुतेर्ते, तुर्की के तैय्यब एर्डोगन या फ़िनलैंड के फिन्न्स पार्टी ये सभी उस एजेंडा को बढ़ावा देते हैं जो लोकप्रिय है पर बुद्धिजीवी वर्ग की नजर में तार्किक नहीं है और सामाजिक और आर्थिक दृश्टिकोण से गलत | गौरतलब ये है की ये सभी देश लोकतान्त्रिक देश हैं जहाँ आर्थिक पूंजीवाद है | आईये समझते  हैं की क्या कारण है की लोकतंत्र में लोकमतवादी विचार बढे जा रहे हैं |

लोकतंत्र  और पूंजीवाद का मिश्रण एक ऐसा संयम है जहाँ पूंजी,श्रम, और खबरें (जानकारी) बहुत तेज़ी से समाज के हर वर्ग के पास फैलता है| इंटरनेट के आगमन ने इस गति को और कई  गुना ज्यादा बढ़ा दिया है | वैश्वीकरण और उदारीकरण ने जहाँ पूंजी के  बहाव को आसान बना दिया है, वहीँ इंटरनेट के आगमन ने समाज में परिवर्तन की गति को भी बहुत ज्यादा बढ़ा दिया है|

इस परिवर्तन के कारण वर्त्तमान आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में बहुत तेज़ी से परिवर्तन आ रहे हैं और ये परिवर्तन इतने ज्यादा हैं की ये लोगों को अपने ही जीवन काल में काबिल से नाकाबिल बना दे रहे हैं | इस का एक उदहारण लीजिये आज  का आईटी इंडस्ट्री | पिछली सदी के नब्बे और इस सदी की शुरूआती दशक में जिन लोगों ने जिस कुशलता और जानकारी से आईटी कंपनियों में अपनी नौकरी शुरू की थी, वो सारे कौशल और जानकारी अब पुराने हो चुके हैं और उनकी उन्ही कंपनियों को कोई जरूरत नहीं है | हम देख रहे हैं की आईटी इंडस्ट्री में मिडिल मैनेजमेंट स्तर पर लोग निकाले जा रहे हैं क्योंकि अब उन स्किल की जरूरत ही नहीं है | पश्चिम के देशों में, अमेरिका में, यूरोप में अकाउंटेंट के काम, कमर्शियल क्लर्क के काम  भारत और फिलीपींस जैसे देशों में जा रहे हैं और वहां के लोग या तो नयी कुशलता हासिल कर रहे हैं या बेरोजगार हो रहे है| और ये सब इतनी तेज़ी से हो रहा है की लोगों के पास समय नहीं है इन बदलाव से एडजस्ट कर सकें | ऐसी स्थिति में अगर किसी कारण से आर्थिक मंदी आ जाए तो फिर परेशानी कई गुणा बढ़ जाती है | पिछला वैश्विक आर्थिक मंदी का दर्द अभी तक गया नहीं है | 

इन परिवर्तनो का एक असर ये हुआ है की एक बड़ी जनसँख्या उदारीकरण, वैश्वीकरण और विकास से अलग थलग हो गयी | इस जनसख्या का कोई नेता नहीं है, इस का कोई एजेंडा समाज  के मुख्यधारा में नहीं आता है | पूंजीवादी बुद्धिजीवी सब वैश्वीकरण, उदारीकरण के पक्षधर हैं और समाजवादी और वाम वादी सब गरीब और निचले वर्ग के हिमायती | ये वर्ग जो पूंजीवादी व्यवस्था से फायदा ले रहा था अब उस को उस व्ययस्था से ही नुक्सान नज़र आने लगा | ब्रिटैन का ब्रेक्सिट इस का सटीक उदहारण है | 

पूंजीवादी व्यवस्था में विकास से सब से ज्यादा फायदा ऊपर के 5  से 10  प्रतिशत लोगों को होता है | इनके पास पूंजी है, इनके पास जानकारी है और श्रम ये निचले स्तर के लोगों से खरीद लेते हैं | अगले 25 प्रतिशत लोग इस का कुछ फायदा लेते हैं और इस उम्मीद में रहते हैं की उन्हें भी ऊपरी 10 प्रतिशत में जाने का मौका मिलेगा | बाकि 65 प्रतिशत लोग ऊपरी 35  प्रतिशत लोगों के लिए काम करते हैं और उनकी स्थिति में कुछ ज्यादा अंतर नहीं आता है |  

लोकतंत्र में समाज के शीर्ष के 10 प्रतिशत वाले लोग समाज का एजेंडा तय करते हैं | उनकी मीडिया है, उनकी  ही राजनीती और उनकी ही अर्थनीति होती है | इनके एजेंडा में ऊपरी 35 % लोग शामिल होते हैं और फायदा पते हैं पर एजेंडा में  मुख्यतह  बाकि के 65 % को एक बाजार मानकर चलाया जाता है |  समाज के मुख्यधारा में जन संवाद निचले वर्ग के हिसाब से होती है पर फायदा 35 प्रतिशत वाले ले जाते हैं | उदारीकरण, वैश्वीकरण और इंटरनेट की वजह से इस फायदा का प्रसार धीमा हो गया और समाजों में आय की विषमता बढ़ गयी |इंटरनेट और आउटसोर्सिंग ने बीच वाले 25 % वर्ग को विभाजित कर दिया – एक जो शीर्ष वर्ग के साथ मिलकर इस वैश्वीकरण से लाभ ले रहा है और दूसरा जो इस के दुष्प्रभाव का असर झेल रहा है | अंत में निचला 65 % वाला  | ये लोकतंत्र की लोकमतवादी ताकत है की ऐसे समय में एक नेता उदय हो जाता है जो इन लोगों के लिए एक एजेंडा तय करता है और सब उस के पीछे हो लेते हैं | डोनाल्ड ट्रम्प के समर्थक हैं मध्य लाल राज्य जो  वैश्वीकरण के फायदे से वंचित रह गए | इंग्लैंड में मध्य वर्ग काफी दिनों से वैश्वीकरण और उदार अप्रवासी निति का विरोध कर ही रहा था | मेक्सिको बॉर्डर पर दीवाल बनाना ऊपरी 10 प्रतिशत बुद्धिजीविओं को बेकार लगता होगा पर उन लोगों को जिनकी नौकरी इन मेक्सिकन लोगों के पास चली जाती है उनके लिए ये सब से बड़ा मुद्दा है | अब फिर भारत का रुख करते हैं | नब्बे और 2000 के दशक में उदारीकरण, वैश्वीकरण और इंटरनेट पर आधारित इंडस्ट्री द्वारा किये गए विकास और उन सब से हुए रोजगार में बृद्धि से कुछ पढ़े लिखे लोगों को फायदा हुआ और अस्सी के दशक में जो ग्रेजुएट लोगों को भी नौकरी मिलने की किल्लत होती थी वो ख़तम तो नहीं हुई पर कम जरूर हो गयी | पर इस दौरान अर्थ व्यवस्था का कोई और सेक्टर बढ़ा ही नहीं | विनिर्माण उद्योग, मुलभुत उद्योग, कृषि और कृषि आधारित उद्योगों में कोई विकास हुआ नहीं| तो ऐसे में आय विषमता स्वाभाविक थी | मनमोहन सिंह की सरकार ने मनरेगा के तहत बड़ी स्तर पर पैसा ट्रांसफर कर के ग्रामीण इलाकों में विषमता को काम किया |

पर 65 प्रतिशत निचले वर्ग को देखा जाये तो पिछले दस सालों में मनरेगा भी अपना असर खो चुकी है और ग्रामीण इलाकों में असंतोष बढ़ता जा रहा है |

बुद्धिजीविओं की माने तो पैसा देना या लोन माफ़ी से कोई फायदा नहीं होता है पर वो अपनी पूरी अर्थव्यवयस्था को पीछे धकेल देती है | उनके हिसाब से अर्थव्यवस्था में मुलभुत सुधर करने की जरूरत है और लम्बी अवधि के कार्यक्रमों को चलने की जरूरत है जिस से सकारात्मक बदलाव आये | पर राजनीति की  माने तो ये साफ है की ये बड़ी जनसँख्या है और बहुत बड़ा वोट बैंक है जिस की इक्षा और असंतोष को आप अनदेखा नहीं कर सकते हैं | मनमोहन सरकार ने भी आधार प्रोग्राम को शुरू किया और उस का उद्द्येश्य लम्बी अवधि में पुरे देश की जनता को सीधे सरकार से जोड़ने का था | तो मोदी सरकार ने जहाँ लम्बी अवधी के मुलभुत सुधारों के लिए काम लिए, वहीँ इस ने तुरंत लोकप्रिय प्रोग्राम भी चलाया | 90 प्रतिशत लोगों का बैंक अकाउंट के दायरे में लाना, कृषि इन्शुरन्स, जन आरोग्य आयुष्मान भारत स्कीम इत्यादि आगे चलकर ग्रामीण इलाकों में निर्धनता और उस से होने वाली समस्या का निदान करेंगे | पर इन सब का फायदा समय के साथ होगा, और लोगों की परेशानी तो तुरंत ख़तम करनी होती है | “अंत में तो सब की गति एक ही होती है ” , बड़े अर्थशाष्त्री कीन्स ने कहा था , पर अंत तक रुक तो नहीं सकते हैं | गरीबी हर दिन की परेशानी है, और अर्थशास्त्र के थ्योरी में भूख का दर्द तो नहीं होता है| तो आज के गरीब को, जिस को वैश्वीकरण, उदारीकरण और इंटरनेट ने नहीं छुआ, उस को तो आज ही राहत चाहिए | सरकार अर्थशास्त्र की सुने या लोकदर्द को सुने | इस लिए मोदी सरकार ने सीधा बैंक अक्काउंटों में पेंशन देने की योजना शुरू की | ये कोई नयी योजना नहीं है और पूरी दुनिया में विक्सित देशों में इस तरह के कई स्कीम चलते हैं | मैं यहाँ ऑस्ट्रेलिया में हूँ और यहाँ हर ऑस्ट्रेलियाई को बेरोजगार होने पर एक भत्ता मिलता है जिस से की वो एक गरीबी की खाई में न चला जाए| लोकमतवाद समाज के अंतिम व्यक्ति तक आवाज पहुंचाता है |   


ये लोकतंत्र और पूंजीवाद की मिलीभगत है की यहाँ हर किसी की सुननी पड़ती है | पूंजीवाद पैसा बनाता है और लोकतंत्र में लोकमतवाद उस को समाज में बांटता है |

जहाँ समाजवाद पूंजी को बांटने में ही केंद्रित रहता है वहां पूंजीवाद पूंजी को बढ़ाने में केंद्रित रहता है | और पूंजी  बढती है तो लोकतंत्र ये सुनिश्चित करता है की हर एक व्यक्ति के पास उस बढे पूंजी का शेयर मिले |  हाँ एक बात जरूर है की तंत्र में इक्षा शक्ति होनी चाहिए और ईमानदारी होनी चाहिए | पिछले सत्तर सालों से हमारे देश की सरकारों के लिए देश की  पचास प्रतिशत जनसँख्या मौजूद ही नहीं थी क्योंकि उनका कोई डाटा ही नहीं था और इस लिए सरकार के तंत्र ऐसे थे की पैसों की नदी बहती थी और रस्ते में ही भ्रस्टाचार की आग से सुख जाती थी | इस सरकार ने ये सुनिश्चित किया है की पैसा लोगों के पास पहुंचे | पहले बैंक से जोड़ा, फिर आधार को सर्व मान्य बनाया, शाशन को टेक्नोलॉजी की मदद से पारदर्शी बनाया और फिर सारे स्कीम चलाये |  


मैं ये मानता हूँ की लोकमतवाद लोकतान्त्रिक समाज को घोर पूंजीवाद से बचता है | जब तक हम लोकतंत्र में विश्वास करते हैं ये मान कर चलना चाहिए की अगर आप शीर्ष के  35 प्रतिशत जनसँख्या में आते हैं तो आप हर दिन देश के 65% जनता के लिए कुछ काम कर रहे हैं और ये आपके लिए लोकतंत्र में रहने की फीस है | 

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