मैथिली कविता : रुकू नहि, झुकू नहि

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थाकू नहि रुकू नहि, झूठक लग झुकू नहि,
हमहीं बुुधियार पैघ अपना के ठकू नहि।
कटुता नहि हृदय मे, फूसि-फकट बकू नहि,
विग्रह कय फूटू नहि, कलह हेतु डटू नहि।

संशय मे सटू नहि, सिद्धांत सं हटू नहि,
निष्फल भविष्य देखि जान लगा खटू नहि।
चालि आ’ चरित बिगाड़ि लोक सं झट कटू नहि,
बढक प्रयास करू, कनियो टा घटू नहि।

ककरो दय आश्वासन मुंह फेरि नठू नहि,
छांटू नहि प्रभुता कें, गौरव सं फटू नहि।
आगत के स्वागत हो बीतल के रटू नहि।

सज्जन सं संगत हो, दुर्जन लग सटू नहि
क्रोधक पझैल आगि, पजरय लय फुकू नहि।
लोभ आ’ लालच कें आंगन में अट्कू नहि,
कर्म धर्म त्यागि कुकर्मक पथ भटकू नहि।

  • Varnan Live.

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