भगवान गणपति ही विघ्नों के विनाशकर्ता

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– गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली


एकदन्तं महाकायं लम्बोदरं गजाननम्
विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बम् प्रणमाम्यहम्

जो एक दांत से सुशोभित हैं, विशाल शरीर वाले लम्बोदर हैं, गजानन हैं तथा जो विघ्नों के विनाशकर्ता हैं, उन गणपति को प्रणाम है।
गणपति भगवान शिव के समस्त गणों के स्वामी हैं एवं उनकी पूजा के बगैर कोई भी शुभ कार्य शुरू नहीं होता है, क्योंकि वे विघ्नहर्ता हैं। उनकी आराधना के बिना किसी भी कार्य का बिना दोष (विघ्न) के सम्पन्न होना दुर्लभ होता है, ऐसा चाणक्य का मानना है।
विघ्न या बाधाएं सबसे अधिक गुप्त शत्रुओं के द्वारा रची जाती हैं और इन शत्रुओं से रक्षा विघ्नहर्ता करते हैं।
गणपति की उत्पत्ति की कथा तो आपको ज्ञात ही है। अपने शरीर पर लेपे गये हल्दी मिश्रित उबटन से देवी पार्वती ने गणपति को रचा और उन्हें अपने स्नान के दौरान आने वाले विघ्नों को दूर रखने की आज्ञा दी। हल्दी मिश्रित उबटन से उत्पन्न होने के कारण उनका रंग हल्दी की तरह पीला हुआ और वे विघ्नहर्ता हैं।
गणपति के इस प्रसंग में अनेक प्रतीक हैं। किसी भी कार्य के सम्पूर्ण होने में लॉजिक या बुद्धि आपको अनेक प्रश्नों पर अटकाते हैं, जैसे- अगर मैं सफल नहीं हो पाया तो? मेरी कार्यक्षमता कम तो नहीं है? क्या शत्रु मुझ पर हावी हो जाएंगे? लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं?
बुद्धि का काम अति-विश्लेषण करना है, जिसके फलस्वरूप आप द्वन्द्व में उलझे रहते हैं। शिव ने गणपति का सिर अलग किया, क्योंकि शिव पारमेष्ठि गुरु हैं और हमें द्वन्द्वों से परे ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
प्रथम पूज्य गणपति हमारा सूत्र पशुपति शिव से जोड़ते हैं, जिसके बाद समस्त कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हो जाते हैं। द्वन्द्व हमारे कार्यों की सिद्धि में सबसे बड़ा विघ्न हैं। इन विघ्नों के कारण ही हम कई कार्यों को आरम्भ ही नहीं करते हैं, इसे टालमटोल कहते हैं।
दूसरा विघ्न हमारे मन में छुपा हुआ अहंकार है। इस बात का अहसास कि यह कार्य मेरे लिए छोटा है, या मेरे लायक नहीं है, दरअसल हमें छोटा बना रहा है।
गणपति का सिर हाथी का है, जो जशुओं में सबसे बड़ा है। उनकी साधना हमें विराटता की ओर ले जाती है। विराटता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा शत्रु हैं, जिनका अन्त हरिद्रा गणपति साधना के द्वारा सम्भव है।
जीवन में जिसके पास आकर्षण-शक्ति है, उसमें अपने शत्रुओं को स्तम्भित करने की क्षमता होती है और ऐसे व्यक्ति ही पूर्ण सफल रहते हैं। तंत्र शक्ति युक्त हरिद्रा गणपति, गणपति साधना का सर्वश्रेष्ठ स्वरूप है।
साधक जब भी अपने जीवन में शत्रु बाधा से ग्रसित हो या शत्रु पक्ष उस पर हावी होने का प्रयास कर रहा हो तो भगवान गणपति के हरिद्रा स्वरूप की साधना अवश्य सम्पन्न करनी चाहिए। भगवान गणपति विघ्नहर्ता हैं और जीवन में नित्य प्रति के विघ्न तो भगवान गणपति के स्मरण मात्र से समाप्त हो जाते हैं।
हरिद्रा गणपति का स्वरूप साधक को स्तम्भन शक्ति से युक्त कर देता है, जिससे शत्रु पक्ष शांत हो जाते हैं और उनके द्वारा उत्पन्न किये हुए विघ्न भी समाप्त हो जाते हैं। हरिद्रा गणपति साधना की पूर्णता होते-होते शत्रु पक्ष आपके अनुकूल होकर आपके पक्ष में आ जाता है। हल्दी रंग के पीतवर्णी हरिद्रा गणपति के विषय में मान्यता है कि मां पीताम्बरा (बगलामुखी) देवी ने हरिद्रा गणपति को अपने सदृश पीले रंग से रंजित कर दिया और उन्हें आशीर्वाद दिया कि जो भी उनकी साधना करेगा, उसके सभी कार्य सम्पन्न हो जाएंगे और उनके जीवन का स्वर्णिम पक्ष आरम्भ होगा।
किसी भी बुधवार अथवा शुभ मुहूर्त में हरिद्रा गणपति साधना प्रारम्भ की जा सकती है। यह साधना प्रात: अथवा रात्रि, किसी भी समय की जा सकती है। हरिद्रा गणपति साधना में समय की बाध्यता नहीं है। इस साधना को साधक अपने समय अनुकूल सम्पन्न कर सकता है।

विशेष जानकारी के लिए ‘निखिल मंत्र विज्ञान’, मेन रोड, हाईकोर्ट कॉलोनी, जोधपुर (राजस्थान), फोन- 0291-2624081/2638209 से सम्पर्क किया जा सकता है।
(साभार : ‘निखिल मंत्र विज्ञान’)

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