अल्पसंख्यक और उनका ‘डर’

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प्रवीण कुमार झा
वरिष्ठ विश्लेषक व समीक्षक

मुझे लगता है कि देश के हर एक अल्पसंख्यक को दिल बड़ा कर एक बार अवश्य सोचना चाहिए कि उन्होंने पिछले 50-60 वर्षों से जिनको वोट किया, बदले में उन्होंने आपको क्या दिया? तुष्टीकरण की नीति का साथ देकर कौन सी संतुष्टि मिली भला आजतक? हिन्दू जितना जातिवाद में बर्बाद हुआ, उससे कहीं ज्यादा अल्पसंख्यक एक खामखां के डर में मुख्यधारा से अलग रखे गए। नतीजा यह है कि देश के कुछेक पिछड़े इलाकों को छोड़ दें तो अल्पसंख्यक समुदाय में गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और कुरीतियां सर्वाधिक है।

आजतक लालू यादव या मुलायम सिंह जैसा न तो इनका कोई ऐसा नेता हुआ, जो अपने समुदाय-विशेष का भला सोचे और न ही कोई ऐसा नेता, जो इन्हें झूठे सम्प्रदायवाद के डर के एवज में क्या मिला, वो बता सकें। जो कुछ निकम्मे मिले, वो तात्कालिक फायदे के लिए या तो बोटी-बोटी काटने की बात करते मिले या फिर 20 मिनट के लिए पुलिस हटाने की बात मात्र करते रहे या किसी राजनैतिक दल के उपाध्यक्ष/प्रवक्ता बन कर ‘मोक्ष’ को पा गए …। और तो और, वो दिन भी देखा है इस देश ने, जब मस्जिद के ईमाम हिटलरी बयान जारी किया करते थे – ‘सुनो मुसलमानों, फलाना दल ने सम्प्रदायवाद से बचने को मेरे एकाउंट में इतने लाख दे दिया है, तुमलोग इस बार उनको वोट करो’ –

अफसोस कि न तो ये दल इन्हें सम्प्रदायवाद से बचा सके और न ही इस कौम विशेष को
समाज की अगड़ी पंक्ति का हिस्सा बना पाए… वही दो हाथ, दो पैर, दो आंख, कान, एक नाक, दिमाग और लाल खून रखकर भी इस समाज का बड़ा हिस्सा आज भी घुंट घुंट कर जीता है…. इस देश का होकर भी सौतेला होने की फीलिंग पाता रहता है। दरअसल, इस देश में जैसे एक फर्जी नागपुरिया फौज है, जो दशकों से हिंदुओं पर खतरा देख रहा है, ठीक वैसे ही फर्जी मौलाना, उलेमा और मदरसे वाली फौज भी है, जिन्हें इस्लाम खतरे में दिखता है। अगर नहीं दिखता है तो बस वो बच्चा, जिसका पेट नहीं भरता, वो बच्चा जो स्कूल का मुंह नहीं देख पाता, वो बच्चा जिसका समुचित इलाज नहीं हो पाता, वो औरत जो कई बच्चों के साथ तलाक की बलि चढ़ जाती है… वो भी जो पर्दे में घुंट-घुंटकर बीमारियां पालती हैं। ठंडे दिमाग से सोचिए तो पाएंगे कि न तो हिन्दू खतरे में है और न ही मुसलमान, बल्कि इस डर ने किसी को खतरे में किया है तो वो है भारत मां और उसके बच्चे।
(यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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