विनाश की ओर जा रहे हम!

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SAROJ KUMAR JHA.

पर्यावरण दिवस अर्थात् पर्यावरण सुरक्षा को याद दिलाने वाला दिन। शायद बाकी दिन हमें इसकी सुरक्षा का ध्यान नहीं रहता या लोकतंत्र को कथित तौर पर खतरे में देखकर हमें यह एहसास नहीं होने देता कि हम मानव समुदाय जिस आवरण में घिरे हैं, उसकी सुरक्षा सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

आश्चर्य की बात है, कभी हिंदू खतरे में होता है, तो कभी मुसलमान, परंतु हम उसकी फिक्र नहीं करते, जिसके तले हमारा मानव समुदाय ही खतरे में है। भारत में कुल 21% वन हैं। विशाल जनसंख्या और तेजी से दोहन होते प्राकृतिक संसाधनों के मद्देनजर यदि सोचें तो ऐसा प्रतीत होगा कि हम उस बदतर स्थिति में आ चुके हैं कि अब अपनी अगली पीढ़ी को कुछ देने के लायक नही छोड़ेंगे। हम किस विनाश की ओर जा रहे हैं, इसका आकलन इसी से लगाया जा सकता है कि वैदिक भारत की सदानीरा नदी गंडक के निकटवर्ती इलाकों में भी पृथ्वी-जल का घोर संकट होने लगा है। बिहार के उत्तरी इलाके हाल तक प्राकृतिक जल की प्रचुरता के लिए विख्यात थे और अब विगत कुछ वर्षों से अनेक क्षेत्रों से चापाकल सूखने की खबरें आ रही हंै। यह भविष्य की अनहोनी का संकेत है, जो हमें यह सतर्क करने लगा है कि वो दिन अब दूर नही जब पेट्रोल पंप की तर्ज पर शायद पानी के भी पंप लगाने पड़ेंगे। हम धार्मिक अंधविश्वासवश कभी जनसंख्या-वृद्धि को अनिवार्य मानते हैं तो कभी विशाल जल वाली नदियों को प्रदूषित करते हैं।

ऊर्जा-प्राप्ति के लिए कोयला या ऊर्जा के अन्य स्रोतों पर पुरानी निर्भरता ने अब देश के कई इलाकों को खोखला कर दिया है। हाल में ही उड़ीसा में फनी तूफान प्राकृक विपदा का एक मामूली उदाहरण है। इसी से कल्पना करें कि आधुनिकता के दौर में प्राकृतिक विपदाओं का स्वरूप क्या होगा। बढ़ती जनसंख्या के आवास की पूर्ति के लिये आसमान छूती इमारतें चाहिए और उनकी जीविका के लिये कारखाने चाहिए। यही नहीं, यातायात हेतु सड़क-निर्माण भी चाहिए! आखिर इन सबकी पूर्ति कैसे होती है? जाहिर तौर पर हम जंगलों की अंधाधुंध कटाई करते हैं। जितनी संख्या में पेड़ों की कटाई हो रही है, उस अनुपात में हम 5% भी वृक्षारोपण नहींकरते। सजावट वाले गमलों में नन्हें से पौधे में अपना प्रकृति प्रेम दर्शाते हैं। सनातन रिवाज अनुसार हमारे घर में एक तुलसी का पौधा अनिवार्य थे। तुलसी की जगह भी अब प्लास्टिक के पौधे लेने लगे हैं। भारत की संस्कृति प्रकृति-पूजक की रही है। हम धर्म के राजनीतिक स्वरूप को लेकर राजनीति करते हैं या फिर दंगे-फसाद भी, परंतु जिस छत के नीचे हमारा मानव समुदाय है, यदि वो छत गिर जाए तो जाति या मजहब का कोई आधार ही नहीं बचेगा। उपाय यही है कि हम आधुनिक बनें, परंतु प्रकृति के विरुद्ध कोई कदम न उठायें। यदि हमसे पर्यावरण की क्षति होती है तो उसी अनुपात में या उससेज्यादा हम पर्यावरण-सुरक्षा की दिशा में ठोस योगदान दें। प्रकृति प्रेम को एक गमले में दर्शाने के साथ-साथ उन वीरानों को आबाद करें, जिनकी वीरानी की वजह हम और हमारी जरूरतें रही हैं। अत: हम सब मिलकर यथासंभव प्रयास करें कि हम अपने स्तर से नदी, भूमि, जंगल या अन्य प्रकृति-प्रदत्त संसाधनों का कम से कम दोहन करें और यदि दोहन करें भी तो अथक प्रयास से उसी अनुपात में उसके अस्तित्व के विकास में योगदान भी दें, अन्यथा हम न तो स्वंय सुरक्षित रहेंगे, न ही अपने भविष्य की पीढ़ी को एक बेहतर कल देकर जायेंगे।

पर्यावरण सुरक्षा मानव सुरक्षा और मानव सुरक्षा तभी धर्म-रक्षा यही ध्येय हो हमारा।

जय भारत!

(लेखक युवा समीक्षक व विचारक हैं)।

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