शैक्षणिक संस्थान नहीं, ये आर्थिक उपक्रम हैं

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– अनंत महेन्द्र
एक अखबार में फुल साइज विज्ञापन पृष्ठों पर दृष्टि पड़ी। दो दिनों पूर्व ही मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट के परिणाम आए थे। सो देश के दो बड़े मेडिकल कोचिंग संस्थानों के प्रचार अभियान भी शुरू हुए। पन्ने पलटते हुए सभी सफल छात्रों को मन ही मन बधाई दे ही रहा था कि तस्वीरों और सफल छात्रों की तस्वीरों को गौर से देखा। हतप्रभ हुआ थोड़ा। फिर और गौर से देखा। अब विश्लेषण की मुद्रा में था। कुछ बिंदु नोट किए :-

  • देश का टॉपर अर्थात रैंक-1 निखिल खंडेलवाल पहले इंस्टीच्यूट के डिस्टेन्स कोर्स का छात्र था, साथ ही दूसरे कोचिंग के क्लासरूम कोर्स का भी छात्र था।
  • रैंक-2 भाविक बंसल पहले के क्लासरूम कोर्स और दूसरे के डिस्टेंस कोर्स का छात्र था।
  • रैंक-4 स्वस्तिक भाटिया पहले के क्लासरूम और दूसरे के डिस्टेन्स कोर्स का छात्र था।
  • वहीं आश्चर्यजनक रूप से रैंक-5 अनंत जैन दोनों ही संस्थानों में क्लासरूम कोर्स का छात्र था।
  • उसी प्रकार रैंक-8 ध्रुव कुशवाहा और रैंक-9 मिहिर राय पहले में क्लासरूम और दूसरे में डिस्टेन्स कोर्स का छात्र था।

    अब मैं इस सोच में पड़ गया कि क्या इन सभी ने वाकई दोनों संस्थानों से मेडिकल की तैयारी की है। अगर नहीं, तो दोनों संस्थान प्रचार के इस अंधी दौड़ में साझीदार तो नहीं, क्योंकि सिर्फ एक केस (रैंक-5) में छात्र ने दोनों संस्थाओं से क्लासरूम कोर्स किया है। मतलब नियमित कक्षाएं की है। अन्य सभी में या तो क्लासरूम या डिस्टेन्स कोर्स किया है। मतलब, प्रचार में इस बात का ध्यान रखा गया होगा। डिस्टेन्स वालों को भी संस्थाएं अपने ड्रेसकोड वाले टी-शर्ट (फोटोशॉप्ड) में दिखाती हैं।
    और अगर ये तथ्य सही हैं, अर्थात छात्रों ने वाकई दोनों संस्थाओं में तैयारी की हो, तो अभिभावकों को एक मूक संदेश जाता है कि अगर आपके बच्चे मेडिकल की परीक्षाओं में देश भर में शीर्ष दस में आना चाहते हैं तो उन्हें कम से कम दो बड़ी कोचिंग संस्थाओं से पढ़ाई करनी होगी। चूंकि, शिक्षा की वर्तमान व्यावसायिक व्यवस्था में शिक्षा में निहित अर्थ में अर्थ का अर्थ बदलकर अर्थ (धन) हो गया है। पूर्णत: आर्थिक उपक्रम बने इन संस्थानों में टॉपर्स को करोड़ों का लालच दे उनके नाम और तस्वीर का अपने प्रचार में उपयोग कर उनकी सफलता को भुनाया जाने लगा है। इन विज्ञापनों से छोटे शहरों और ग्रामीण बच्चे व अभिभावक आकर्षित होकर कूद पड़ते हैं इस मायावी संसार में, जहां लाखों के खेल हैं। तो आइए हम और आप, और पैसों की बचत शुरू करें, ताकि हमारे बच्चे भी बनें टॉपर्स।

    (लेखक युवा साहित्यकार व समीक्षक हैं)।

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