|सम्पादकीय| …और बिखर गया जातिवादी गठबंधन

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विजय-रथ को रोकने के लिए उत्तरप्रदेश में परस्पर विपरीत विचारधाराओं वाली समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का जातिवादी गठबंधन लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद आखिर बिखर ही गया। एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाने वाले इन दोनों दलों ने इस गठबंधन में चौधरी अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल को भी अपने साथ लिया था, लेकिन अब तीनों के रास्ते अलग-अलग हो गये हैं। इन तीनों दलों ने लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ अपने साझा उम्मीदवार उतारे थे। इनका उद्देश्य सिर्फ नरेन्द्र मोदी की सरकार को दुबारा सत्ता में आने से रोकना था। प्रधानमंत्री मोदी ने उस समय यह भविष्यवाणी की थी कि यह गठबंधन किसी बड़े उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि सिर्फ चुनावी फायदे के लिए किया गया है और चनाव परिणाम आने के बाद यह बिखर जाएगा। मोदी की यह भविष्यवाणी बिल्कुल सच साबित हुई और चुनावी नतीजे आने के महज एक पखवारे के भीतर ही इस गठबंधन में शामिल दल अलग-अलग हो गये। बसपा सुप्रीमो मायावती ने हार का ठीकरा सपा पर फोड़ा है। मायावती के अनुसार उनके उम्मीदवारों को उत्तरप्रदेश में यादवों का समर्थन नहीं मिला तो सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने अपनी विफलता यह कहकर छुपाने की कोशिश की है कि वह इंजीनियरिंग के छात्र रहे हैं और गठबंधन का प्रयोग किया था, लेकिन यह जरूरी नहीं कि हर प्रयोग सफल हो। लगता है कि अखिलेश उत्तरप्रदेश विधानसभा का चुनाव भूल गये, जब उन्होंने राहुल गांधी को अपनी ‘साइकिल’ पर सवार कर कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें नकारकर भाजपा को प्रचंड बहुमत दी थी। मायावती की बसपा को भी इस चुनाव में जोरदार झटका लगा था और वह हाशिये पर चली गयी थी। लेकिन लगता है, इन दोनों दलों के नेताओं ने विधानसभा चुनाव में हुई पराजय से कोई सबक नहीं ली। अब बिहार में भी कांग्रेस-राजद के महागठबंधन का यही हश्र होने वाला है। इसके संकेत मिलने लगे हैं। लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त के बाद बिहार में कांग्रेस के अन्दर राजद से अलग होने की सुगबुगाहट तेज हो गयी है। कांग्रेस और राजद में दूरी बढ़ने लगी है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ-साथ पार्टी के कुछ बड़े नेता भी राजद से अलग होकर अलग राजनीतिक पारी खेलने की वकालत करने लगे हैं। वे लोकसभा चुनाव में शर्मनाक हार के लिए राजद की नीतियों और फैसलों को जिम्मेवार बता रहे हैं। दरअसल, वर्ष 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद जिस तरह से भाजपा का विस्तार हुआ, उससे सभी विपक्षी दल भयभीत हैं और यही भय उन्हें हर चुनाव में एकजुट होने पर मजबूर करता रहा है। इस लिहाज से देखें तो उत्तरप्रदेश अथवा अन्य प्रदेशों में विपक्षी दलों का गठबंधन किसी सैद्धांतिक जमीन पर नहीं, बल्कि भाजपा के भय से नकारात्मक आधार पर होता रहा है। जबकि नकारात्मक विचारधारा कभी भी दीर्घजीवी या फलदायी नहीं हो सकती। लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष का होना भी बहुत जरूरी है, पर नकारात्मक सोच के साथ आज जिस राह पर विपक्षी पार्टियां चल रही हैं, निकट भविष्य में उनके लिए भाजपा के रथ को रोक पाना आसान नहीं लग रहा। इसके लिए सबसे पहले उन्हें जातिवादी मानसिकता से ऊपर उठकर देश की जनता का मन-मिजाज परखना व समझना होगा!

  • Editor.
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