एक राष्ट्र, एक चुनाव पर हंगामा क्यों?

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  • प्रस्तुति : सुरेन्द्र कुमार
    लेखक, शिक्षक एवं विचारक (हिमाचल प्रदेश)।

विश्व के सर्वोच्च लोकतांत्रिक देश की चुनावी व्यवस्था, जहां एक ओर दुनिया की सबसे खर्चीली मतदान प्रक्रिया है, वहीं दूसरी ओर इसके असर से देश का विकास भी बार-बार हतोत्साहित होता रहता है। भारत का आम नागरिक भले ही देश में आयोजित होने वाले इस विख्यात महापर्व में बढ़-चढ़कर भाग लेता हो, पर इसके लगातार बढ़ते आर्थिक भार से वह आज भी अनजान है। देश में एक लोकसभा चुनाव को संपन्न करवाने में जितना धन व्यर्थ होता है, उसके सदुपयोग से विश्व के कई देशों की आर्थिकी को सहजता से सींचा जा सकता है। आज भी यदि सरकार देश में 1957 से प्रतिबंधित ‘एक देश एक चुनाव’ की व्यवस्था को पुन: लागू करती है तो इससे भारत को बड़े पैमाने पर आर्थिक लाभ हो सकते हैं। बीते हफ्ते इसी मुद्दे पर प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी, जिसमें बहुत से राजनीतिक दल सरकार के पक्ष में उपस्थित रहे तथा कई दल सरकार की इस पहल के विरोध में अनुपस्थित रहे। जबकि कुछ दलों ने उपस्थित होने के बावजूद इसका विरोध किया। फलस्वरूप बैठक बेनतीजा संपन्न हुई, जिससे स्पष्ट होता है कि देश में राजनीति का स्तर किस कदर दिशाविहीन होता जा रहा है। यहां विपक्ष सरकार के किसी मुद्दे की आलोचना राष्ट्रहित के मद्देनजर नहीं, बल्कि पार्टीहित को साधते हुए करता है। देश में विपक्ष कभी-कभी सत्ताधारी दल के कल्याणकारी फैसलों को भी कटघरे में खड़ा करता नजर आता है तथा कभी राष्ट्रविरोधी निर्णयों की भी सराहना करता प्रतीत होता है। विपक्षी पार्टी का कार्य यहां सत्तारूढ़ पार्टी की योजनाओं को दुरुस्त करना नहीं, बल्कि योजनाओं की घोर निंदा करना है। इसके अनेक उदाहरण हम विगत कुछ वर्षों से भलीभांति निहारते आए हैं। वर्तमान में एक देश एक चुनाव पर भारत में मचा सियासी घमासान इसका एक जीवंत उदाहरण है। एक राष्ट्र एक चुनाव एक ऐसी व्यवस्था है, जिसके व्यवहार से देश में अनेकों सहूलियतें मुहैया हो सकती हैं।
आंकड़ों पर यदि गौर करें तो कहा जाएगा कि हाल ही में भारत में संपन्न हुआ लोकसभा चुनाव-2019 दुनिया का सबसे महंगा चुनाव था। सात चरणों में संपन्न हुई इस मतदान प्रक्रिया में विभिन्न दलों ने लगभग 60 हजार करोड़ रुपये खर्च किए। यह आंकड़ा किसी निजी न्यूज चैनल या संस्था का नहीं, बल्कि सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की अधिकारिक रिपोर्ट से लिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्र्ष 1998 के आम चुनावों में चुनावी व्यय 06 हजार करोड़ रुपये था, जो 2014 के लोकसभा चुनावों में बढ़कर 03 हजार 800 करोड़ के करीब जा पहुंचा था। जबकि 2019 में इसमें दुगुनी वृद्धि हुई है। इस बार के मतदान में प्रति मतदाता सियासी दलों ने करीब 700 रुपये खर्च किए हैं। जबकि देश के प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र में इस बार औसतन 100 करोड़ रुपये बहाया गया है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि जिस बहुमूल्य राशि से हमारे देश में एक लोकसभा चुनाव संपन्न होता है, उस पैसे से देश के कई राज्यों का वार्षिक बजट सिंचित किया जा सकता है। इसी प्रकार यदि इसमें देश के विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव खर्च को भी जोड़ा जाए तो राशि से हम विश्व के कई देशों का वार्षिक बजट पेश कर सकते हैं। अब सवाल यह उठता है कि आखिर देश में एक साथ चुनाव कराने से हमारे विपक्षी दल क्यों कतरा रहे हैं? इस पर इतना हंगामा क्यों बरपा है? इसके व्यावहारिक इस्तेमाल से नफा नुकसान किसका होगा? क्या इसके लागू होने से भाजपा को लाभ होगा या क्षेत्रीय दलों को नुकसान होगा? एक स्वच्छ राजनीति का आधार राष्ट्र प्रेम है या पार्टी हित? ये कुछ अहम सवाल है जो देशवासियों को वर्षों से झकझोर रहे हैं। एक सच्चाई यह भी है कि जो नेता आज तक मोदी के अधिकतर निर्णयों की आलोचना करते फिरते थे। एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर सरकार के साथ चर्चा के लिए बैठक में उपस्थित हुए। सीताराम येचुरी और असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार की इस पहल का पूरी तरह से कटाक्ष किया। जबकि शरद पवार, फारुख अब्दुल्ला, नवीन पटनायक, जगन मोहन, डी. राजा ने लगभग अपनी सहमति जताई। इन्हें एक साथ चुनाव करवाना फायदेमंद प्रतीत हो रहा है। जबकि कांग्रेस, आरजेडी, आप, टाएमसी, बसपा, सपा आदि दलों को वन नेशन, वन इलेक्शन मोदी जी का कोई मिशन लगता है। उनका कहना है कि यह सरकार का लोगों को मूर्ख बनाने का एक जुमला है। यदि सरकार वास्तव में इस व्यवस्था को लागू करना चाहती है तो इसके लिए इतना हो-हल्ला करने की जरूरत नहीं है, बल्कि संसद में इससे संबंधित अध्यादेश लाने की आवश्यक है।
विडंबना देखिए, जिस निर्णय को सरकार सरेआम जनता के समक्ष पास व फेल करवाना चाहती है, विपक्षी नेता उसे संसद के अंदर चर्चा के लिए धकेलने के मूड में हैं। सर्वदलीय बैठक में देश के सभी राजनीतिक दल मुद्दे पर खुलकर अपनी मंशा, राय और शंका जाहिर कर सकते हैं। जबकि संसद में केवल निर्वाचित प्रतिनिधि ही चर्चा में शामिल हो सकते हैं। अंदर जीत सत्ताधारी दल की सुनिश्चित है, पर बाहर सरकार को सबकी सुननी पड़ेगी। बावजूद इसके मोदी-विरोधियों को यह उनकी कोई सोची-समझी चाल लग रही है। अरे भाई! जब आपको सरकार सरेआम वातार्लाप के लिए निमंत्रण दे रही है तो आप चर्चा से किनारा कर रहे हैं, लेकिन यदि आपको बिना पूछे सरकार अपने स्तर पर कोई फैसला लेती है तो आपको वह असंवैधानिक लगता है।
अब यदि हम एक देश, एक चुनाव के व्यवहारिक फायदों का जिक्र करें तो कहा जाएगा कि इसके लागू होने से भारत का चुनावी आर्थिक बोझ कम होगा, विकास योजनाएं बेरोक-टोक चलती रहेंगी। सुरक्षा बलों पर कम दबाव रहेगा। देश में स्वच्छ राजनीति को बढ़ावा मिलेगा, क्षेत्रीय दलों की मनमानी कम होगी। इसके अलावा भी इस व्यवस्था के लागू होने से देश को अनेक सुविधाएं साल दर साल बिना रुकावट हासिल होती रहेगी। अत: हम कह सकते हैं कि देशहित की खातिर भारत के सभी राजनीतिक दलों को वर्तमान सरकार की इस ऐतिहासिक पहल का भरपूर समर्थन करना चाहिए, ताकि देश का बहुमूल्य पैसा व समय दोनों का इस्तेमाल सही से हो सके तथा देश को एक बार फिर एक देश एक चुनाव के व्यवहार का सुखद अहसास हो सके।

  • Varnan Live.
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