ऐसी आजादी और कहां?

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  • अनंत महेन्द्र

    आजादी पर बहुधा प्रश्न उठते रहते हैं। अभी भी हम आजाद कहां हैं, ये कैसी आजादी और तो और लड़कर लेंगे आजादी जैसे वाक्य यदा-कदा सुनने को मिल जाते हैं। मुझे लगता है आपातकाल वाली अवधि को छोड़ दिया जाय, तो भारतीय मीडिया को सम्पूर्ण आजादी मिली हुई है। विशेषकर आर्थिक उदारीकरण के उपरांत इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के उत्थान के बाद बढ़ते निजी समाचार चैनलों के दायरे सुरसा के मुख की भांति बढ़ते रहे हैं। बाढ़ में डूबते व्यक्ति के मुंह पर माइक रखकर पूछा जाने लगा कि आप डूब रहे हैं, आपको कैसा महसूस हो रहा है! खैर, यह तो उपमा की बात हुई। परन्तु, बोरवेल में गिरे पांच साल के बच्चे की बचाव गतिविधि को लगातार 36 घंटे का कवरेज देकर राष्ट्रीय मुद्दा बनाने की अद्भुत क्षमता रखती है मीडिया। जब कोई डोंडियाखेड़ा का साधु स्वप्न की बात बताता है और कहता है कि अमुक स्थान में सोने की खदान है, तब भी मीडिया के ओवी वैन युद्धस्तर पर क्रियाशील हो जाते हैं और लग जाता है मजमा ‘राष्ट्रीय हितार्थ’। मीडिया की स्वतंत्रता की बानगी तब पारदर्शी रूप में दिखती है तब, जब होटल ताज में आतंकवादी हमला होता है और इनकी रिपोर्टिंग सैन्य अभियान की मूवमेंट बताकर जाने-अंजाने आतंकियों को लाभ पहुंचा देती है। सेना के दस्तावेजों की खुफिया जानकारी लेनी हो अथवा किसी मिशन का ब्लूप्रिंट, इनके सूत्र सारे समीकरण प्रस्तुत करने में समर्थ होते हैं। ये सियाचिन भी पहुंच सकते हैं। न सिर्फ पहुंच सकते हैं, अपितु वहां पहुंचकर विशेष प्रशिक्षित जवानों के विशेष यंत्र से लेकर पूरे तंत्र का सजीव सीधा प्रसारण करने को भी स्वतंत्र होते हैं। भले ही इसकी जानकारी शत्रु देशों को हो जाए या वे हमारी सेना की गतिविधियों या क्रियाकलापों को जान लें। ये बिना किसी ठोस आधार पर पृथ्वी की समाप्ति की घोषणा भी कर सकते हैं। प्रलय का दिन बता सकते हैं। ये इतने आजाद हैं कि ये निर्णय ले सकते हैं, किस अपराधी के धर्म या जाति का नाम लेना है और किसे विशेष समुदाय का बताना है।
    मीडिया किसी भी घटना के बाद का नैरेटिव सेट कर सकता है। देश की सोच को मनोवांछित दिशा में मोड़ सकता है। ये पार्क में टहलकर इंटरव्यू ले सकता है, कॉफी पीते-पिलाते और अगर आप मॉडल-अभिनेत्री के साथ सांसद भी हो तो जिम में पुश-अप मारते हुए भी। ये सवाल पूछ सकते हैं, मेरे प्रश्न आपसे, आपके वाले मुझसे, सरकार से पूछे जाने वाले प्रश्न डॉक्टर को। इनकी आजादी कि इंतेहा और क्या कहूं! बस समझ लीजिए कि मीडिया बिना मास्क पहने माइक लेकर आईसीयू में घुसकर चीख-चीख कर प्रश्न भी पूछ सकता है। फिर एक विज्ञापन की पंचलाइन याद आती है- ‘ऐसी आजादी और कहां’!
    (यह लेखक के निजी विचार हैं।)

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