मैथिली कविता- हम नारी छी

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राम चन्द्र मिश्र मधुकर

हम दुर्गा शक्ति स्वरूपा छी, विष्णुक घर लक्ष्मी रूपा छी,
ब्रह्मा घर में ब्रह्माणी छी, गिरिजा शिव घर मे अनूपा छी,
हम बेटी बहिन बनलि जग के, हम मानव के महतारी छी।
हम भारत देशक नारी छी।

हम अर्द्धागिणी बनलि स्त्री, तं कखनहुं हम परित्यक्ता छी,
हम विधवा रूप अशोभन छी, हम पतिक प्रेम अनुरक्ता छी,
मन्दिर मे देवक दासी छी, हम पूज्या रूप कुमारी छी,
हम भारत देशक नारी छी।

हम पुरुष पात्र के भोग्या छी, नहि वेद ज्ञान के योग्या छी,
हम जन्महिं सं अभिशप्त बनलि, हम करुणा नोर रहलि डूबलि,
अछि रूप अपावन हमर दृष्टि, हम घेरल रही विकारी छी,
हम भारत देशक नारी छी।

हम रज छी सृष्टिक वृज स्वरूप, धारण कय गर्भ करी पोषण
हमरे कोखिक फल पुरुष रूप, जे करय हमर अनुखन शोषण,
मधुकर नारी नारी जीवक, मंगलकारी सुखकारी छी
हम भारत देशक नारी छी।

नर कें जें काम उजोहि चढय, तं हमर खुशामद खूब करय,
जें अपन कामना व्यक्त करी, मारय छाती पर लात धरय,
हम सदा उपेक्षा पात्र बनलि, हम तारण के अधिकारी छी
हम भारत देशक नारी छी ।

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