पात्रता को तीक्ष्ण करने का महापर्व है दीपावली : गुरुदेव श्री नन्दकिशोर श्रीमाली

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Gurudev N.K. Shrimali

दीपावली पर हर साल आप लक्ष्मी और गणेश का पूजन करते हैं। घर में धन-धान्य, सुख-संपत्ति के आगमन की प्रार्थना करते हैं। आइए, दीपावली में छिपे लक्ष्मी पूजन एवं गणेश वन्दन के गूढ़ार्थ को समझने का प्रयास करते हैं। लक्ष्मी आपके पास अवश्य आएगी, जब आप बुद्धि से युक्त होकर कार्य करेंगे, अहंकार से रहित होंगे और स्वाभिमान से युक्त होंगे। द्वन्द्व से रहित होकर निरंतर कार्यरत रहेंगे और सुमति से युक्त होंगे।
भारत की धर्म-संस्कृति में प्रत्येक परंपरा के पीछे कारण अवश्य है। राम के 14 वर्ष के वनवास के बाद घर वापसी पर दीपावली का पर्व मनाया जाना ‘असतो मा सद्गमय’ का द्योतक है। असत्य यानि अंधकार से सत्य अर्थात प्रकाश की ओर जीवन ले जाने का पर्व है।
प्रकट तौर पर दीपावली प्रकाश पर्व है, आनंद एवं उल्लास का उत्सव है, जिसकी अभिव्यक्ति दीपों की माला, दोस्तों से मिलना-जुलना एवं फुलझरियां जलाना है। पर दीपावली उल्लास की इन अभिव्यक्तियों से अधिक गहन और प्रगाढ़ है, जिसे समझने के लिए सुर-असुर के बीच हुए संघर्ष को समझना होगा। विष्णु पुराण के अनुसार एक बार दुवार्सा ऋषि वैकुंठ लोक से आ रहे थे रास्ते में ऐरावत हाथी पर बैठे इंद्र को उन्होंने कमल के फूलों की एक माला भेंट की, लेकिन वैभव में डूबे इंद्र ने अहंकार में उस माला को ऐरावत के सिर पर फेंक दिया। ऐरावत हाथी ने उस माला को अपने पैरों तले कुचल दिया। ऋषि दुवार्सा ने इसे स्वयं के साथ कमल के फूलों पर बैठने वाली लक्ष्मी जी का भी अपमान माना। इसलिए इंद्र को श्रीहीन होने का शाप दे दिया और उनका सारा वैभव समुद्र में गिरकर समा गया। दैत्यों ने स्वर्ग पर अपना अधिकार कर लिया। स्वर्ग का वैभव और राज्य फिर से पाने के लिए विष्णु ने समुद्र मंथन करने की योजना बनाई, जिससे लक्ष्मी देवी के साथ अमृत भी उत्पन्न हुआ, जिसके लिए सुर और असुर के बीच घनघोर विवाद छिड़ गया। उस विवाद का हल करने के लिए विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण करके छल से अमृत को देवताओं में बांट दिया। विष्णु के पास लक्ष्मी सागर से निकलकर स्वयं आ गई थीं और अमृत देवताओं को मिल गया। वास्तव में लक्ष्मी जब आती है तो उसके साथ ही साथ अहंकार छल, बल और कुबुद्घि भी आ जाते हैं। जो इन दोषों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं, लक्ष्मी उनके पास स्थिर अवस्था में रहती है और जो इन दोषों को अपना गुण बना लेते हैं, लक्ष्मी उनसे दूर चली जाती हैं।
अमृत मंथन से लेकर आज तक मनुष्य लक्ष्मी को पाने के लिए संघर्ष कर रहा है, क्योंकि जिसके पास लक्ष्मी है, वह समर्थ से युक्त और दोष-मुक्त है। हर कोई उसके समीप आना चाहता है, क्योंकि वह देवताओं की भांति अपनी कृपा दृष्टि से मनुष्य का जीवन बदल सकता है।
हिन्दू धर्म में दीपावली का त्यौहार एक अवसर है, प्रत्येक व्यक्ति को लक्ष्मी की निधियां एकत्र करने के लिए। मनुष्य के मन में सदियों से लक्ष्मी को आबद्ध करने की इच्छा को कार्यान्वित करने का समय दीपावली की रात है। किसी प्रयोजन को शुरू करने के लिए दीपावली की रात स्वयं सिद्ध मुहूर्त है। इस रात व्यापारी बही-खाता बदल देते हैं और अपने नए वित्तीय वर्ष का आरंभ करते हैं।
जैसे जल है तो कल है, वैसे ही लक्ष्मी आपके जीवन में रहती हैं, तब उल्लास हंसी-खुशी, उत्सव का माहौल रहता है, जिसकी अनुभूति हमें दीपावली पर होती है। लक्ष्मी और जल का अभिन्न संबंध है। समुद्र मंथन से लक्ष्मी उत्पन्न हुई हैं। प्रचलित लक्ष्मी के चित्र में दो श्वेत हाथी उन पर जल बरसाते हैं। जैसे जल हमारे जीवन के लिए अनिवार्य है, उसी प्रकार लक्ष्मी जीवन को गतिशील करने वाली तत्व है। लक्ष्मी का एक नाम कमला है, क्योंकि वे कमल पर आसीन हैं। कमल कीचड़ भरे जल में उगता है, पर उसमें निर्लिप्त नहीं होता है। उसी प्रकार लक्ष्मीपति किसी भी परिस्थिति में द्वंद्व रहित होकर धन प्राप्ति के लिए कर्मरत रहता है।
लक्ष्मी और भूख दोनों एक ही सिक्के के दो पक्ष हैं। लक्ष्मी भूख मिटाने वाली शक्ति हैं, हमें तृप्त करती हैं, कामनाएं पूर्ण करती हैं। इसलिए इनकी पूछ है, सभी को लक्ष्मी चाहिए। दीपावली की रात लक्ष्मी पूजन तीन सत्यों की पुनरावृत्ति है।
तमसो मा ज्योतिर्गमय
असतो मा सद्गमय
मृत्योर्मा अमृतंगमय
जब तक जीवन है, तब तक लक्ष्मी जरूरी है और उसे पाने के लिए कोई भी कीमत किसी भी काल में बड़ी नहीं रही है। लक्ष्मी के लिए रावण ने अपने भाई कुबेर को लंका से निष्कासित कर दिया और कौरवों ने छल से पांडवों का राज छीन लिया। लक्ष्मी को प्राप्त करने के लिए देवता, दानव एवं मनुष्य, तीनों छल का सहारा लेते हैं। जरूरत पड़े तो बल का भी। बात तो यही हो गई कि सफलता के लिए कोई भी कीमत बड़ी नहीं है। कई बार हम जीवन में सफलता को जीवन का लक्ष्य मान लेते हैं। जीवन का लक्ष्य तो स्वयं जीवन है। कहा भी गया है जान है तो जहान है।
आमतौर पर मनुष्य के लिए जीवन की अभिव्यक्ति शरीर है। इसलिए लक्ष्मी जिसके पास होती हैं, वह व्यक्ति अपने शरीर के सुखों या इंद्रिय सुख के प्रति सतर्क रहता है, जैसे भोजन, वस्त्र, आवास, मन-बहलाव।
इंद्र भी प्रतीक रूप में इंद्रिय सुख है, स्वर्ग का वैभव इंद्रिय सुखों का चरमोत्कर्ष है और उस सुख को बनाए रखने के लिए इंद्र को लक्ष्मी का सानिध्य चाहिए, बिना लक्ष्मी के इन्द्र भी श्री विहीन हो जाते हैं। अर्थात शरीर के सुखों में जब हमारी आसक्ति बढ़ती है, हमारा लक्ष्मी को हड़पने की मानसिकता भी घनीभूत होती है। यह मानसिकता आसुरी है, रावण और दुर्योधन की है, लेकिन इंद्र भी इस मानसिकता से परे नहीं हैं। जहां ऋषियों का तपोबल बढ़ा, इंद्र ने अप्सराओं को भेज उन्हें इंद्रिय सुख के प्रपंच में फंसा दिया, क्योंकि इंद्र को स्वर्ग के सिंहासन को सुरक्षित रखना है। मतलब अगर लक्ष्मी आपके पास है तो संघर्ष भी साथ होगा, क्योंकि लक्ष्मी तो दूसरों को भी चाहिए। ऐसा कौन है, जिसे लक्ष्मी नहीं चाहिए? पर लक्ष्मी को कौन चाहिए?
उत्तर तुलसी बता रहे हैं-
जहां सुमति तहां संपत्ति नाना
जहां कुमति तहं विपत्ति निदाना
लक्ष्मी तो बुद्धिमान व्यक्ति के साथ है। छल तो सुरों का भी था। अमृत मंथन में मोहिनी रूप में, परंतु उस छल में बल शामिल नहीं है। उसमें बुद्धि का प्रयोग हुआ है, तार्किक बुद्धि, अन्वेषक बुद्धि, जो परिस्थिति का चीर-फाड़ कर उसमें से अपना भला निकाल ले। समस्याओं को कुतरकर रास्ता बना सकें। ऐसी बुद्धि, ज्ञान, विवेक देते हैं शक्तिपुत्र गणपति।
तंत्र में शक्ति का स्रोत महालक्ष्मी हैं और शक्ति के अंश गणपति उन्हें पूरा कर देते हैं। गणपति प्रथम पूज्य हैं, क्योंकि उनके पास वह मति है, जो उन्हें प्रश्नों को देखने का एक बिल्कुल अलग दृष्टिकोण देती है। जब संसार की परिक्रमा करनी होती है, गणपति माता-पिता की परिक्रमा कर लेते हैं, क्योंकि संतान का संसार उसके माता-पिता होते हैं। जिसमें पात्रता होती है, उसके पास लक्ष्मी हैं और गणपति भी सुपात्र के साथ ही हैं। लक्ष्मी से इंद्र का अहंकार भी नहीं सहन होता है और रावण का भी नहीं। लक्ष्मी की शब्दावली में युक्ति और छल में भेद है, क्योंकि पात्रता तो वही निर्धारित करती हैं। दीपावली पात्रता को तीक्ष्ण करने का महापर्व है।
(साभार : निखिल मंत्र विज्ञान)

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