हम्माम में सब …….

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मोदी सरकार ने इस बार जनता के सामने ईमानदार सरकार होने का दावा किया है और इस बात को एक बड़ी चुनावी मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया है |  वास्तविकता क्या है ये तो कोई नहीं जानता है पर ये सरकार ईमानदार नजर तो जरूर आती है | जनता को क्या इस बात से खुश होना चाहिए या ये भी सोचना चाहिए की क्या ये सरकार वाकई में ईमानदार है और आगे भी ईमानदार रहेगी?


ये तो सही  है की इन पांच सालों में सरकार और पार्टी के लोगों के खिलाफ कोई भ्रष्टाचार के आरोप नहीं लगे हैं।  मोदी सरकार ईमानदार दिखती तो जरूर है। और ये जरूरी है की सरकार ईमानदार हो भी और ईमानदार दिखे भी।  कहीं ये पढ़ा था की ईमानदार परन्तु अप्रभावी शाशक से ज्यादा अच्छा है की शाशक थोड़ा भ्रष्ट हो पर प्रभावी हो | ईमानदार और प्रभावी शाशक तो आदर्श है।  तो मोदी सरकार अभी तक तो ईमानदार के साथ प्रभावी भी है। सो भारत की जनता खुशनसीब है।

सवाल ये है की क्या इस सरकार की शुचिता और स्वक्षता बरकरार रहेगी आने वाले दिनों में। 

महाभारत के अंत काल की एक कहानी याद आ रही है।  त्रेता युग का अंत हो चूका था और कलयुग का प्रारम्भ नहीं हो पाया था। काऱण ये था कि राजा परीक्षित बड़े ही सत्यवान और प्रतापी थे जिस की वजह से उनके राज में असत्य, अनाचार, अधर्म  की कोई जगह ही नहीं थी।  कलयुग को आने के लिए कोई स्थान ही नहीं मिल रहा था। तो एक एक दिन कलयुग ने  एक ब्राह्मण का भेष बनाया और राजा के पास पहुँच गया।  राजा ने पूछा तो उस ने सारी बात बता दी।  भला इतने न्याय पसंद राजा इस बात को कैसे अनदेखा कर सकते थे ? राजा का ये भी कर्त्तव्य था की वो यह सुनिश्चित करे की प्रकृति का नियम निर्विघ्न चलता रहे। सो राजा परीक्षित ने कलयुग से कहा की जब तक उनका शाशन है  तब तक कलयुग किसी भी तीन प्रकार के जगह में रह सकता है – सोने में, मदिरा में या, वो स्थान जहाँ वेश्यावृति हो। कलयुग को कोई ऐसा स्थान नही मिला जहाँ मदिरा सेवन हो रहा हो और न ही कोई ऐसा स्थान मिला जहां वेश्यावृत्ति हो रही हो – ऐसा था राजा परीक्षित का राज्य, सत्य  धर्म पर आधारित।  सो कलयुग को कोई और उपाय नहीं मिला और उस ने राजा के स्वर्ण मुकुट में अपना स्थान बना लिया।  अगले दिन राजा शिकार को गए और रह भटक गए।  प्यास से पीड़ित उन्होंने एक साधू को तप में लीन देखा और उन से पानी माँगा।  साधू को ध्यान में लीन थे सो कोई जवाब नहीं दिया।  राजा को क्रोध हुआ और उन्होंने में पास पड़े एक मृत साँप को तलवार से उठा कर साधू के गले में लपेट दिया और आगे चले गए।  कुछ देर बार साधू का पुत्र आया और उस ने अपने पिता के गले में लपेटा सर्प देखा तो गुस्से में श्राप पढ़ दिया की  जिस ने ऐसा कर्म किया है उसे सर्प राज तक्षक सात दिनों के अंदर मृत्यु लोक पहुंचा देगा।  श्राप सत्य हुआ और राजा परीक्षित की मृत्यु हुई और कलयुग का प्रारब्ध हो गया। 

स्वर्ण और स्वर्ण मुकुट धन और सत्ता शक्ति का परिचायक है और इन दोनों का संयम कलयुगी  शक्तियों को बढ़ावा देती है और उनको पोषती हैं। मुकुट सत्ता द्वारा दिए गए जिम्मेदारी का प्रतीक है 


कलयुग में आएं तो हम देखते हैं की स्वतंत्रता के तुरंत बाद नेहरू जी की सरकार भी सत्ता और  धन लोलुप मंत्रियों और अधिकारियों के बेमानी से नहीं बच पायी।  उस  के बाद तो सत्तर सालों तक सरकारों ने मुकुट और स्वर्ण ( स्वर्ण मुकुट = सत्ता और धन ) का उपयोग एक दूसरे का हित साधने के लिए किया।  सो मोदी सरकार ने मुकुट ( सत्ता = जिम्मेदारी) तो धारण किया है पर अभी तक ,ऐसे कोई ऐसा प्रामाणिक वाकया सामने नहीं आया है जिस से ये कहा जा सके की इस सरकार में किसी ने स्वर्ण मुकुट का धारण किया है।  पर सवाल ये है की अगले पांच साल भी क्या मुकुट पर स्वर्ण नहीं चढ़ेगा ?  मोदी जी आप तो संत हैं और राजर्षि राजा जनक की तरह आप कीचड़  में कमल की तरह हैं पर क्या आप ये सुनिश्चित  कर सकते हैं की भारत के सजनीतिक  परिपेक्ष में कोई कमल अगले पांच सालों में मुर्झायेगा नहीं और कोई मुकुट स्वर्ण मुकुट बन जाने की कोशिश नहीं करेगा ?  
मोदी जी मैं आपके सरकार द्वारा किये कुछ निर्णयों पर आपका ध्यान दिलाना चाहता हूँ और आपको आगाह करना चाहता हूँ की ये निर्णय बहुत सारे मुकुटधारियों में स्वर्ण जटित मुकुट की लालसा पैदा कर देंगे।  

सब से पहले मैं आपका ध्यान वित्त विधेयक 2018 की ओर दिलाना चाहता हूँ जिस में आपकी सरकार ने विदेशी कंपनियों को राजनैतिक पार्टियों को फण्ड करने की छूट दे दी और इतना ही नहीं उस को किसी भी ऑडिट या पूछ ताछ से अलग रखा।  सोचिये की विदेशी शैल कंपनियों को आपने  क्या हथियार दे दिए हैं।  दुसरा आपने भारत में इलेक्टोरल फण्ड को वैध कर दिया है और उस के डोनर को अज्ञात  रखा है। मुझे ये अंदेशा हो रहा की  ये दोनों पालिसी आपको अगले पांच सालों में कहीं परेशानी न दें।  
ये सोचिये की एक N.R.I है और  उस ने कहीं विदेश में, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका या और कहीं जैसे मॉरिशस में एक कंपनी खोली और 49 % किसी विदेशी कंपनी या विदेशी व्यक्ति को दे दिया। ये कंपनी उस व्यक्ति के लिए ही खोली गयी क्योंकि वो  है एक आर्म्स डीलर। इस N.R.I ने भारत में एक ब्रांच खोला और किसी राजनैतिक पार्टी को दान दिया।  इस दान का कोई ऑडिट नहीं होगा।  तो फिर हमारे आर्म्स डीलर ने जाकर डील किया और किक बैक का पैसा इलेक्टोरल बांड में दे दिया। सभी कुछ गुमनाम और सभी कुछ कानूनी।  इन पैसों का कोई ऑडिट नहीं और इलेक्टोरल बांड का कोई नाम नहीं।  अब हो सकता है की कुछ लोग शुरू में इस का इस्तेमाल करें पर कुछ ही दिनों में  सब लोग इस विधा में माहिर हो जाएंगे। मोदीजी आप देखेंगे की कुछ ही दिनों में आपके हर मुकुट पर सोने की परत चढ़ जायेगी और जैसे कोयले के व्यापार में कालिख लग ही जाती है वैसे ही आप भी इस स्वर्ण मुकुट के प्रभाव से अछूते नहीं रहेंगे।  कोई न कोई आपके गले में सर्प फाँस डाल ही जाएगा।   मेरे ख़याल में सब से पहले तो आप ये विदेशी फंडिंग के ऑडिट वाले प्रावधान को ख़तम कीजिये और दूसरा इलेक्टोरल बांड में गुमनामी ख़तम कीजिये।  मुझे इस बात का आभास है की राजनीती राजधर्म से चलती है और सामान्य जिंदगी सामान्य धर्म से।  आप राजधर्म के हिसाब से भी सोचिये की इन निर्णयों से आपको कोई व्यक्तिगत लाभ हो या ना हो – और आपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कभी कोई काम किया भी नहीं है – पर इस से राजनीतिक लाभ लोगों को जरूर मिलेगा और लोग इस का फायदा जरूर निकालेंगे|

मुझे लग रहा है की आपके इस कार्यकाल में कोई राफेल कांड नहीं हुआ, मगर यदि ये दोनों प्रावधान बदले नहीं गए तो अगले कार्यकाल में आप की सरकार पर बड़ी दाग लगने की सम्भावना बहुत ज्यादा है क्योंकि सत्ता बेमानी को जन्म देती है और पूर्ण सत्ता पूर्ण लम्पटता। 

हम इतिहास की वजह से क्यों बंट जाते हैं

मैं अक्सर सोचता हूँ की हमारे देश में इतिहास पर विचार और विवेचना क्यों नहीं होती है जिस तरह पश्चिमी देशों में होती है | अच्छा, बुरा, सही, गलत सब पर विचार और व्याख्यान इतिहास विज्ञानं का विषय है | हमारे देश में क्यों नहीं ? जिस देश का इतिहास इतना अतीत, विशाल और विविध हो उस देश में इतिहास से ये उदासीनता ?

Taj Mahar, photo from internet

इतिहास ऑस्ट्रेलिया का

मैं ब्रिस्बेन ऑस्ट्रेलिया में रहता हूँ और एक वाकया इस सन्दर्भ में उपयुक्त है सो बताता हूँ | मेरा बेटा दूसरी कक्षा में था और उस के स्कूल से स्टडी टूर के लिए ब्रिस्बेन से 25 किलोमीटर दूर एक 150 साल पुराने फार्म हाउस में ले जाने का कार्यक्रम बना | क्योंकि लगभग 40 बच्चे थे और सिर्फ 2 शिक्षक ( दो कक्षाओं से), अभिभावकों से अनुरोध किया गया साथ चलने को अगर समय हो तो | मैं उस वक्त घर से ही काम करता था और मेरे पास समय भी था और मैंने सोचा ये अच्छा मौका था स्कूल से जुड़ने का | सो मैंने हाँ कर दी और लगभग 40 बच्चों और 2 शिक्षकों के साथ फार्म हाउस पहुँच गया | पूरा अनुभव मेरे लिए शिक्षाप्रद था, बच्चे तो बाद में कुछ सिखते |


गवर्नर इंग्लैंड की रानी का शाशन चलाता था और बहुत सारे अपराधी यहाँ दासों की तरह रहते थे और इस फार्म में काम करते थे |

पूरा दिन उन बच्चों ले लिए इतिहास का क्लास था | सब से पहले उस फार्म हाउस के अहाते में घास पर बैठ कर क्लास हुई और उनको उस फार्म हाउस के बारे में बताया गया | वह फार्म हाउस 1850 के गवर्नर का घर था | बच्चों को गवर्नर का मतलब बताया गया और फिर ये बताया गया की उस वक्त लोग कैसे रहते थे, क्या कहते थे, कैसे सोते थे, नौकर लोग कहाँ और कैसे रहते थे, इत्यादि | ये भी बताया गया की उस वक्त जब ऑस्ट्रेलिया एक अपराधी कॉलोनी था और इनके पूर्वज सजायाफ्ता अपराधी जिन्हे इंग्लैंड से देश निकला दे दिया गया था और इस कॉलोनी में भेज दिया गया गया था | गवर्नर इंग्लैंड की रानी का शाशन चलाता था और बहुत सारे अपराधी यहाँ दासों की तरह रहते थे और इस फार्म में काम करते थे | उनको ये भी बताया गया आदिवासी लोग मुख्या समाज का अंग नहीं थे और उनको शहर में रहने की इजाजत नहीं थी | पूरी क्लास ये सुनती रही और पूछ लिया, ” मिस, क्या ये सच कि लोगों ने एबोरिजिनल ( आदिवासी) लोगों को मार दिया”? इस बात पर टीचर ने बहुत सहजता से कहा, ” दुर्भाग्य से हाँ ” | इस क्लास के बाद खाने का समय हो गया और सब बच्चों ने अपने – अपने टिफिन से खाना खाया | खाने के बाद सारे बच्चों को 5 ग्रुप में बाँट दिया गया और हर ग्रुप को एक रोल करना था और इस तरह हर बच्चा हर रोल एक बार करता | एक ग्रुप संभ्रांत वर्ग – गवर्नर और उस के परिवार – का रोल कर रहा था और उसी दौरान एक ग्रुप नौकरों का रोल कर रहा था, एक ग्रुप किचेन का काम कर रहा था इत्यादि | ये देख कर लगा की ये समाज जीतनी सहजता से अपने इतिहास के हर पहलु को स्वीकारता है उतनी ही सहजता से आज समाज के हर वर्ग को बराबर मानकर चलता है | इतिहास पीछे है और इनकी दृष्टि आगे |

अपने इतिहास के लिए भारतीय कुंठा

मैं कई दिनों तक सोचता रहा की हम भारतीय अपने इतिहास को लेकर इतने मनोग्रंथि से क्यों ग्रसित हैं? कई सवाल हैं ज़हन में अभी तक जिनके उत्तर शायद इतिहास के किसी दस्तावेज में दबे हैं जो हमें पढ़ाया नहीं जाता है | जैसे जब मुग़ल आये भारत तो क्या उन्होंने अत्याचार और मार काट नहीं किया ? जिन तुर्क और जिन चंगेज ने मध्य एशिया और पश्चिम एशिया में आतंक और अत्याचार की पराकाष्ठा कर दी पर भारत में वे अच्छे शाशक हो गए | मैं ेंने फिर एन.सी.ई.आर.टी की किताबों को खंगाला और छठी, सातवीं और आठवीं के इतिहास की किताबों को फिर पढ़ा। इन सब किताबों में कहीं आक्रमणकारियों के अत्याचार, या सामाजिक उत्पीड़न का ज़िक्र नहीं है। कहीं धर्म परिवर्तन, और उस के लिए अत्याचार का कोई ज़िक्र नहीं है। कहीं भी हमारे इतिहास में ये पढ़ाया ही नहीं जाता है की अलग मतों (हिन्दुओं के भी) के मानने वालों के बीच लड़ाइयां भी होती थी। फिर हिन्दू और मुसलमान के बीच भी ऐसा कुछ तो हुआ होगा जरूर। जो समाज सदियों से विविधता और विचारों में भिन्नता को बहुत सहजता स्वीकारता रहा वो आज उन्ही विविधता से घबराने कैसे लगा ? हम तो उस समाज के लोग हैं जो ये कहते हैं की ” एकं सत विप्रं बहुधा वदन्ति” | सामाजिक रूप से तो हमारी अर्जुन दृष्टि हमेशा उस एक सत्य पर टिकी होनी चाहिए और हम विभिन्नता हमारी शक्ति | पर आज हमारी दृष्टि बस विभिन्नता पर टिकी है और वो एक सत्य गौण हो गया है।

पर ऐसा क्यों। थोड़ा हाल के इतिहास में जाएँ तो शायद कुछ कारण स्पस्ट होते हैं। ब्रिटिश शाशन काल से ही हमारी भिन्नताएँ हमारे लिए शाशन से एहसान पाने का जरिया हो गया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसर और बाद में अँगरेज़ी हुकूमत ने हमारी विभिन्नताओं को दो तरीके से इस्तेमाल किया। एक तो सामाजिक विभाजन कर सत्ता बरक़रार रखना और दूसरा सामाजिक विभाजन को आर्थिक संसाधनों के विभाजन का आधार बनाकर ब्रिटिश शाशन के हितैषी वर्ग का बनाना और उनका पोषण करना। ब्रिटिश सरकार ने धर्म और जाती के आधार पर उपाधियाँ और जमींदारियां और रैयतें बांटी। सरकार के सामने धर्म और जाति संसाधनों पर अधिकार और वर्चस्व का आधार हो गया। यही कारण था की ब्रिटिश शाशन के दौरान सारे अत्याचारों के आदेश अंगरेज़ों ने लिखे, पर उन का कार्यान्वन भारतीय सिपाहियो या भारतियों क्लर्कों या अफसरों ने बिना किसी शर्म या अपराध बोध के किया। जलियावाला बाग़ में गोलियां भारतीय सिपाहियों ने ही चलाई थी।

दुर्भाग्यवश आज़ादी के बाद भी हमने जाति और धर्म को अपने संविधान में विशेष अधिकारों का आधार बना दिया। सामाजिक न्याय के लिए हमने आरक्षण को एक जरिया बना लिया । अब जाति के लिए आरक्षण हो तो धर्म के नाम पर भी आरक्षण की बात होने लगी। जिन धर्म में जाति की अवधारणा नहीं है उनके लोगों ने भी पुराने इतिहास को खंगाला और ऐतिहासिक प्रतारणा की कहानी गढ़ी और सड़क पर उतर गए। पिछले 70 सालों में हमने इस प्रकार वर्ग के अंदर नए नए वर्ग बना दिए और हर वर्ग अपने विशेषादिकार की सुरक्षा के लिए अपने हिसाब से इतिहास गढ़ने लगा। इन सब में बेचारा इतिहास कहीं रोता बिलखता रह गया। जहाँ इतिहास लोगों के भविष्य का निर्धारण करेगा, वहां इतिहास सच्चाई से अलग और वर्गों की सुविधा को सहेजने के लिए लिखा जायेगा। आज़ादी की लड़ाई के दौरान गाँधी जी इतिहास से बचते रहे और बस इस लिए कि इस से हिन्दू मुस्लिम एकता में बाधा होगी पर हुआ कुछ नहीं। लोगों ने स्वार्थवश उसी इतिहास का इस्तेमाल कर देश का विभाजन कर दिया। हम फिर भी नहीं सुधरे और इतिहास का इस्तेमाल कर के संविधान में ही विभाजन का प्रावधान कर दिया। फिर क्या है, अब हम इतिहास जो पढ़ते हैं वो सहूलियतों वाला इतिहास है और इस पर कोई भी वाद विवाद या विवेचना समाज में विभाजन पैदा कर देता है। अब इस्लामिक शाशन के अत्याचारों की बात नहीं कर सकते क्योंकि तब मुसलामानों के एक वर्ग को आरक्षण मिलता है वो सवालों के घेरे में आ जायेगा। इस से उन लोगों को परेशानी हो जायेगी जो धर्म के आधार पर संसद और विधान सभाओं में सीट चाहते हैं। हम जब जाति प्रथा की बात करते हैं तो ये भी बात करते हैं कि हमारे समाज में परत दर परत अधिकार और विशेषाधिकार है और चार वर्णो पर आधारित आरक्षण की निति में सब कुछ सामान्य नहीं है। ऐसे सवाल से सब बचना चाहते हैं की दिल्ली के साउथ ब्लॉक के बड़े बंगले में रहने वाले सरकारी सचिव के बच्चे भी आरक्षण किस इतिहास के आधार पर लेते हैं।
यहाँ ऑस्ट्रेलिया में सभी बच्चों को एक साथ पूरी इतिहास सच के साथ पढाई जाती है और सच के आधार पर विवेचना की जाती है। यहाँ आने वाले यूरोपियन ने आदिवासिओं की पूरी की पूरी नस्ल को ख़तम कर दिया और अब जो बचे हैं वो समाज का अभिन्न अंग हैं और बराबर के अधिकार के साथ अपनी सामाजिक स्थिति सुधार करने में लगे हैं। सरकार की ओर से उनके लिए विशेष स्कूल हैं, विशेष आर्थिक सहयोग है पर कहीं आरक्षण नहीं है। एक यूरोपियन मूल का बच्चा और एक आदिवासी मूल का बच्चा दोनों एक ही इतिहास पढ़ता है और दोनों इस बात को स्वीकार करता है की कुछ ही पीढ़ी पहले एक के पूर्वजों ने दूसरे के पूर्वजों पर अत्याचार और बर्बरता की होगी पर दोनों इस बात से सहमत होते हैं की सरकार को उस वर्ग को अतिरिक्त सहयोग करना चाहिए – वैसे ही जैसे सरकार अकेली माताओं को अतितिक्त सहयोग करती है, वैसे ही जैसे सरकार गरीबों के बच्चों के लिए विशेष कार्क्रम चलती है। यहाँ सामाजिक परिवर्तन का आधार आर्थिक है और न की ऐतिहासिक।
आप अपने देश में ही देखिये कई निजी या पब्लिक कंपनियों ने दिव्यांग लोगों के लिए नौकरियां देने की निति बनायीं है जहाँ ये उन लोगों को विशेष तौर पर नौकरी देते हैं और उनको अलग से ट्रेनिंग देकर बाकी लोगों के बराबर लाते हैं। यहाँ आरक्षण का स्थायीकरण नहीं है, उन लोगों के बच्चों को वो सुविधा नहीं मिलेगी अगर वो दिव्यांग नहीं होंगे। ऐसी नीति में कोई विवाद नहीं है और हर वर्ग के लोग इस का समर्थन करते हैं। अगर यही किसी जाति या धर्म से जुड़ जाए तो कंपनी के कर्मचारियों में विभाजन हो जाए। अगर समाज में विशेषाधिकार ऐतिहासिक घटनाओं के प्रतिकार के रूप में बांटा जाएगा तो इतिहास भविष्य के विभाजन का कारण बनेगा न की राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीयता का श्रोत।

सीटों की हेराफेरी से बढ़ेंगी राजग की मुश्किलें

रांची/पटना : लोकसभा चुनाव का बिगुल बज गया है। एक तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गंठबंधन (राजग) जहां पिछले चुनाव में पूर्ण बहुमत के साथ देश की सत्ता पर काबिज हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘एकबार फिर मोदी सरकार’ के नारे को फलीभूत करने में लगा है तो दूसरी तरफ भाई-बहन, बुआ-बबुआ, पिता-पुत्र, घर-परिवार, दीदी-जीजा, नाते-रिश्तेदार आदि सबके सब ‘मोदी हटाओ अभियान’ में जी-जान से भिड़ा है। पर चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि 2014 के मोदी की लोकप्रियता में भले ही कुछ कमी आयी है, लेकिन केन्द्र में मिला-जुलाकर मोदी की ही सरकार बनने की उम्मीद है। मसलन, मोदी को पूरी तरह शिकस्त देना उनके विरोधियों के लिए फिलहाल आसान नहीं दिख रहा है। हां! वोटों के अन्तर में कमी होने की बात जरूर सामने आ रही है और इसका मुख्य कारण है सीटों की हेराफेरी और उम्मीदवारों का चयन। अभी हम सिर्फ झारखंड- बिहार की बात करें तो सीटों के तालमेल और उम्मीदवारों की घोषणा के बाद इन दोनों राज्यों में मोदी समर्थकों और मोदी विरोधियों की चुनावी बिसात बिछ गयी है। दोनों ओर से चुनावी दंगल के मोहरे उतार दिये गये हैं। हालांकि इन दोनों ही राज्यों में सीटों की हुई सौदेबाजी में राजग (एनडीए) ने अपनों को ही नाराज किया है। भाजपा ने अपने कई सांसदों व प्रबल दावेदारों के टिकट काट दिये हैं तो जदयू ने चुनावी महाभारत में कई बदनाम चेहरे उतार दिये हैं। इन सबका व्यापक विरोध शुरू हो चुका है और इन परिस्थितियों में यहां राजग की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। इन दोनों राज्यों में भाजपा, जदयू व लोजपा की सीटों में कमी आने का यह एक बड़ा कारण बन सकता है।

गिरिडीह व खूंटी में भाजपाई निराश

झारखंड के गिरिडीह और खूंटी लोकसभा सीट पर भाजपा ने वर्तमान सांसद क्रमश: रविन्द्र कुमार पांडेय और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कड़िया मुंडा के टिकट काट दिये हैं। गिरिडीह से पांच बार चुनाव जीतने में सफल रहे रविन्द्र पांडेय को चुनावी दंगल से बाहर का रास्ता दिखाकर भाजपा ने यह सीट भाजपा ने आजसू की झोली में डाल दी तो खूंटी के सांसद व पूर्व केन्द्रीय मंत्री कड़िया मुंडा की जगह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा को अपना उम्मीदवार घोषित किया है। भाजपा नेतृत्व के इस फैसले से पार्टी के कार्यकर्ता काफी निराश हैं।

रविन्द्र पांडेय के हौसले बुलंद

गिरिडीह से पांच बार सांसद रहे रविन्द्र पांडेय का टिकट भले ही भाजपा ने काट दिया है, लेकिन उनके हौसले अभी भी बुलंद हैं। वे हर हाल में लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। उनका कहना है कि जब शहीद ही होना है तो घर में रहकर क्यों, मैदान में लड़कर शहीद होना पसन्द करेंगे। उन्होंने कहा- राजनीतिक प्राणी हूं। राजनीति में कभी सूर्यास्त नहीं होता। जहां फुलस्टॉप होता है, वहीं से नई सेन्टेन्स की शुरुआत होती है। श्री पांडेय ने अपने कार्यकर्ताओं से बोल्ड रहने की बात कही। हालांकि उन्होंने अभी तक इस बात का खुलासा नहीं किया है कि वह किस दल से चुनाव लड़ेंगे, लेकिन यह साफ कर चुके हैं कि लोकसभा का चुनाव वह जरूर लडेंगे।

कहीं महंगा न पड़े आजसू का दबाव

गिरिडीह से आजसू ने खबर लिखे जाने तक अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है, लेकिन झारखंड सरकार के मंत्री और रामगढ़ के आजसू विधायक चन्द्र प्रकाश चौधरी को उम्मीदवार बनाये जाने की चर्चा जोरों पर है। आजसू यहां भाजपा पर अपना दबाव बनाने में सफल रही है और इसका असर आने वाले विधानसभा चुनाव पर भी पड़ेगा। आजसू क यह दबाव कहीं आने वाले दिनों में भाजपा के लिए महंगा न पड़ जाय, इसकी चिन्ता भी पार्टी कार्यकर्ताओं को सताने लगी है। जानकारों की मानें तो भाजपा ने लोकसभा चुनाव में पहली बार आजसू के साथ इसलिए समझौता किया है, ताकि उसे विधानसभा चुनाव में आजसू का एकतरफा साथ मिले। लेकिन इसमें संदेह है। क्योंकि आजसू सुप्रीमो सुदेश महतो पहले ही कह चुके हैं कि यह तालमेल सिर्फ लोकसभा चुनाव के लिए हुआ है। विधानसभा चुनाव में क्या होगा, इस पर बाद में बात होगी। सुदेश के इस बयान पर गौर करें तो बोकारो जिले की चंदनकियारी विधानसभा सीट आजसू अपने पूर्व विधायक उमाकांत रजक को फिर से अपना उम्मीदवार बनाने पर जोर देगी और अगर उसका दबाव यहां भी काम आया तो वर्तमान में राज्य सरकार के मंत्री और चंदनकियारी के विधायक अमर बाउरी का पत्ता कट सकता है, क्योंकि अमर बाउरी ने पिछला चुनाव झाविमो टिकट पर जीता था और बाद में वह भाजपा में शामिल हुए थे। इसलिए गिरिडीह में आजसू के दबाव में भाजपा का झुकना उसके लिए सुखद
नहीं माना जा सकता।

बिहार के सीतामढ़ी में विद्रोह

बिहार की सीतामढ़ी सीट पिछले चुनाव में राजग के घटक दल रहे रालोसपा के खाते में गयी थी और मोदी लहर में यहां से राम कुमार वर्मा विजयी हुए थे। लेकिन इस बार रालोसपा मोदी-विरोधी महागंठबंधन में शामिल है और महागंठबंधन ने यहां से शरद यादव के प्रत्याशी अर्जुन राय को अपना लालटेन थमा दिया है। जबकि भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं को पुन: निराश कर सीतामढ़ी सीट जदयू के खाते में डाल दी। जदयू ने जैसे ही यहां के एक चिकित्सक डा. बरुण कुमार को अपना प्रत्याशी घोषित किया, जदयू के कार्यकर्ता पटना से लेकर सीतामढ़ी तक विद्रोह पर उतर आये। पार्टी कार्यकर्ता एक बदनाम छवि के व्यक्ति को टिकट देने का कड़़ा विरोध जताने लगे। फिर क्या था, देखते ही देखते सीतामढ़ी में डा. बरुण के ठिकानेपर आयकर विभाग द्वारा की गयी छापामारी में उनके 11 बैंक लॉकर सहित पांच लाख रुपये जब्त किये जाने की खबर वाली अखबारी कतरनें सोशल मीडिया पर तैरने लगीं। एक सर्वेक्षण से यही पता चला है कि काफी मशक्कत के बाद भी यह सीट जीतना राजग (एनडीए) के लिए आसान नहीं होगा। अर्थात राजग पर भीतरघात का खतरा यहां भी मंडरा रहा है। इसी प्रकार भागलपुर से शाहनवाज हुसैन का पत्ता काटना और नवादा से गिरिराज सिंह को हटाकर उन्हें बेगुसराय भेजना भी भाजपा के लिए अच्छा नहीं रहा। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बिहार की 30 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें उसे 22 सीटों पर जीत मिली थी। परन्तु इसबार उसे जदयू के साथ 17-17 सीटों पर समझौता करना पड़ा है और जहां से विगत चुनाव में भाजपा प्रत्याशी जीते थे, उन सीटों पर इस चुनाव में राजग की मुश्किलें जरूर बढ़ सकती हैं। अब तो चुनावी नतीजे आने बाकी हैं, लेकिन कुल मिलाकर यह तो तय माना जा रहा है कि बिहार और झारखंड में राजग को पिछली बार की तुलना में उतनी कामयाबी नहीं मिल पायेगी, पर प्रधानमंत्री मोदी को पूरी तरह शिकस्त देना फिलहाल नामुमकिन दिख रहा है।