मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने किया शुभारंभ, कहा- भारत पुनः विश्वगुरु बनने की ओर अग्रसर

बच्चा बाबू मिस्त्री

नई दिल्ली : नेशनल स्कूल आफ ड्रॉमा, नई दिल्ली में इन दिनों नाट्य कला का बहुरंग लोगों का मन मोह रहा है। अवसर है हीरक जयंती नाट्य समारोह ‘रंग षष्ठि: का। एनएसडी के 60 वर्षों का इतिहास शानदार रहा है और इस आयोजन से जुड़कर कई दिग्गज कलाकार अपनी अभिनय-कला से लोगों को लुभा रहे हैं। हीरक जयंती नाट्य समारोह का शुभारंभ संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने किया। रानावि के अध्यक्ष परेश रावल ने आनलाइन माध्यम से जुड़कर मंत्री एवं प्रेक्षागृह में उपस्थित सभी सुधीजनों के समक्ष अपने वक्तव्य रखे।

इस अवसर पर मंच पर पद्म सम्मान प्राप्त रानावि के पूर्व निदेशक प्रोफेसर रामगोपाल बजाज, सुप्रसिद्ध अभिनेता गोविंद नामदेव, जे.एस. उमा नंदूरी एवं रानावि निदेशक चित्तरंजन त्रिपाठी उपस्थित हुए। मंच संचालन सुप्रसिद्ध अभिनेता श्रीवर्धन त्रिवेदी ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन रंगमंडल प्रमुख राजेश सिंह के द्वारा किया गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल से जुड़े रहे सैकड़ों नामचीन कलाकार उपस्थित हुए। उद्घाटन समारोह के बाद ‘समुद्रमंथन’ नाटक का मंचन किया गया, जिसका निर्देशन चित्तरंजन त्रिपाठी ने किया।

इस अवसर पर अपने संबोधन में संस्कृति मंत्री श्री शेखावत ने कहा कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्थान के 60 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष में संस्थान की कालजई रचनाओं को लेकर यह आयोजन किया जा रहा है और ऐसे लोगों की उपस्थिति में किया जा रहा है, जिन लोगों के प्राण इस संस्थान में बसते हैं। उन सबको प्रणाम करते हुए इस ‘नाट्यशास्त्र’ के मंदिर को नमन किया। कहा कि एक बहुत लंबे उतार-चढ़ाव का दौर इस संस्थान ने विगत छह दशकों के इस कालखंड में देखा होगा। यह मुकाम हमें आत्म-अवलोकन का एक अवसर देता है और हमारे स्मृतियों के वीणा के तार को धंकृत करने का एक सौभाग्यपूर्ण आयाम भी प्रदान करता है।

उन्होंने कहा, ‘भारत जब एक बार फिर परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है, एक ऐसे मुकाम पर खड़ा है, जब पूरा विश्व भारत की तरफ एक बार फिर आशा की दृष्टि से देख रहा, हमें उन संपदा को नियोजित करके आने वाले समय में उपयोगी बनाना है। हमारी सास्कृतिक ताकत थी, जो हमारे जीवन में समाया था, उसका और उसके प्रति आदर का भाव ही भारत की संस्कृति को निरंतर प्रभाहमान बनाए रखा। आज एक बार फिर वही स्थिति बनी है जब भारत विश्वबंधु से विश्वगुरु बनने की तरफ अग्रसर है और विश्वगुरु केवल आर्थिक आधार पर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक ताकत के आधार पर बना जा सकता है। इस तरह की संस्थाओं ने हमारी सांस्कृतिक संपदा को जीवंत रखने का काम किया है। इस कालजयी संस्था को मेरी अनंत शुभकामनाएं।’

– Varnan Live Report.

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