भुवनेश्वर के वरिष्ठ पत्रकार की खोजी पत्रकारिता पर केस स्टडीज प्रकाशित

“ऑपरेशन ब्लैक स्पॉट” डॉ. रवि शर्मा की खोजी पत्रकारिता पर आधारित केस स्टडीज़ की पुस्तक अब प्रकाशित हो चुकी है। यह पुस्तक उनके जन्मदिन, २१ जुलाई को विमोचित की गई, जो अब अमेज़न, फ्लिपकार्ट जैसे सभी ऑनलाइन स्टोर पर उपलब्ध है। इस पुस्तक में न केवल उनकी, बल्कि अन्य खोजी पत्रकारों को काम करते वक्त किन-किन बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए, यह बताया गया है, साथ ही आने वाली कठिनाइयों से कैसे जूझना है, यह भी बताया गया है।


डॉ. शर्मा कहते हैं, “कभी-कभी ज़िंदगी हमें एक किरदार नहीं, एक सबक बना देती है। और जब वो सबक इतने गहरे हों कि शब्दों से बाहर छलकने लगें, तब कलम खुद रास्ता माँगने लगती है। क्या कभी आपने अपनी ही कहानी को किसी और की ज़ुबानी सुना है? पत्रकारिता मेरे लिए पेशा नहीं, प्रतिज्ञा थी। गाँव की मिट्टी से लेकर सत्ता के गलियारों तक, मैंने हर ख़बर को सिर्फ़ देखा नहीं – जिया। कैमरे की आँख से नहीं, ज़मीन की धूल से पढ़ा। सच्चाई को तलाशना मेरी आदत नहीं थी, मेरी ज़िम्मेदारी बन गई थी। लेकिन क्या हर सच्चाई को दिखाना आसान होता है?

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हर रिपोर्ट के पीछे कोई चेहरा था, कोई टूटती उम्मीद, कोई अनसुनी आवाज़। मैंने सोचा नहीं था कि कभी इन चेहरों में एक चेहरा मेरा भी होगा। लेकिन शायद यही पत्रकारिता का सबसे बड़ा इम्तिहान है – जब शब्द खुद अपने खिलाफ गवाही बनने लगें। एक दिन, जब कैमरा मेरी तरफ़ मुड़ा – न बतौर रिपोर्टर, बल्कि एक संदिग्ध के रूप में – तब समझ आया कि ख़बर बनने और ख़बर लिखने के बीच की दूरी बहुत पतली होती है। उस दिन सब कुछ वैसा ही था जैसा हर रिपोर्टिंग के दिन होता है – कैमरा था, जनता थी, सवाल थे। पर इस बार स्क्रिप्ट किसी और ने लिखी थी। अजीब नहीं है?”


“ब्रेकिंग न्यूज़: इंडिया टीवी 24×7 के मालिक पर अपहरण का संगीन आरोप… पुलिस ने किया गिरफ़्तार…”

वो हेडलाइन उसी चैनल की थी जिसने कभी मेरी आवाज़ को दिखाया था, मेरे स्टोरीज को चलाया था। पर उस दिन, वो स्क्रीन मेरी नहीं थी – वो सिर्फ़ मुझे निगलने को तैयार एक तमाशा बन चुकी थी। कैसा लगता है जब आपकी ही बनाई दुनिया आपको पहचानने से इंकार कर दे? स्क्रीनें, जो मेरी रिपोर्टिंग से रोशन थीं, अब मेरे नाम से चमक रही थीं – कुछ और अर्थों में। आवाज़ें जो सच की हामी थीं, अचानक खामोश हो गईं।


बेशक मैं बहुत कुछ खो चुका था – विश्वास, पहचान, आवाज़। लेकिन एक चीज़ अब भी मेरे साथ थी – कलम। वही कलम जिसने पहले दुनिया के अन्याय लिखे थे, अब खुद की लड़ाई भी लिखेगी। क्या ये कलम फिर से भरोसे लाएगी?

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यह किसी व्यक्ति की आत्मकथा नहीं है – यह उस आवाज़ की कथा है जो बार-बार दबाई गई, लेकिन फिर भी लौटी। यह उन गलियों की गंध है, जहाँ एक रिपोर्टर अपनी पहचान ढूंढता है, और उन कोर्टरूम्स की खामोशी है, जहाँ शब्दों को मुजरिम बनाया जाता है। इस किताब में कोई ग्लैमर नहीं है, कोई बनावटी नायकत्व नहीं। यह उन रातों की परछाइयाँ हैं, जिनमें उजाले की उम्मीद टटोलनी पड़ी। यह उन संवादों की बुनावट है, जो कभी ऑन-एयर नहीं जा सके। यह उनकी कहानी है जो पर्दे के पीछे भी सच बोलते हैं, और माइक के बिना भी आवाज़ उठाते हैं। क्या आप उनकी आवाज़ सुनना चाहेंगे? इसमें वो पन्ने हैं जो कभी अख़बारों में नहीं छपे, और वो लम्हें हैं जो किसी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ में नहीं गूंजे। इसमें वो आँसू हैं जो किसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में नहीं दिखे, और वो सवाल हैं जिनके जवाब आज भी हवा में तैरते हैं।

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“ऑपरेशन ब्लैक स्पॉट” में एक्सटेंडेड रियलिटी (Extended Reality) के ज़माने में भी अगर कोई कहानी जो दबा दी गई थी, उसे उठाना है तो क्या करना होगा, ये भी बताने का प्रयास है। अगर आपने कभी किसी सच्चाई की तलाश में खुद को अकेला पाया है, तो शायद ये किताब आपके ही बारे में है। और अगर आपने कभी अपने उसूलों के लिए चुप रहना चुना है – तो शायद ये किताब आपके अंदर कुछ जगा देगी। क्या आप तैयार हैं? यदि हाँ, तो ये किताब “ऑपरेशन ब्लैक स्पॉट” ज़रूर पढ़िए।

  • Varnan Live Report.

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