इंडिगो एयरलाइंस की घटना को एक साधारण कंपनी के व्यवसाइक और व्यापारिक गलत निर्णय मानकर भूल जाने की गलती ना तो जनता को करनी चाहिए़ और ना तो सरकार को| देश में हर दिन लगभग ढाई हजार व्यावसायिक उड़ाने होती हैं और पांच दिसंबर को इन में से एक हजार फ्लाइट को रद्द कर देना पड़ा | इस का मतलब है कि लगभग पूरे देश की वायु परिवहन सेवाएं बस एक कंपनी की गलती की वजह से ठप्प हो गई और वो भी छुट्टियों और शादियों के सब से व्यस्त समय में | लाखों की संख्या में यात्रियों को जो परेशानी हुई है उस का कोई सानी नहीं है | इतनी बड़ी घटना से देश की वायु परिवहन सेवाओं के बारे में पूरी दुनिया में एक बहुत बदनामी हुई है| मैं इस घटना की रिपोर्ट नहीं लिख रहा हूं परन्तु सब से महत्वपूर्ण मुद्दा ये है कि इस के आगे सरकार क्या करती है जिस से ऐसी स्थिति फिर से नहीं आए |
पहली बात, क्या इस घटना की निष्पक्ष और विशेषज्ञ से जांच होगी और जनता को ये पता चलेगा कि गलती किसकी थी और गलती करने वाले को सजा मिली या नहीं? और सजा मिली तो क्या सजा मिली? जब इस कानून को दो साल पहले लागू कर दिया गया था और दिसंबर का दिन बहुत पहले से तय था तो कंपनी ने इस दिन के लिय तैयारी क्यों नहीं की? और अगर मंत्रालय ने इस कानून को लागू कर दिया था तो उन्होंने इस बात को सुनिश्चित क्यों नहीं किया कि सारे एयरलाइंस इस को लागू करने को तैयार है या नहीं ?इन को एयरलाइंस के निर्णयों पर क्यों छोड़ दिया गया था? DGCA, या मंत्रालय के सचिव की जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए और चूक की सजा होनी चाहिए| एयरलाइंस पर एक वित्तीय पेनल्टी होनी चाहिए जिस से हर पैसेंजर को एक मुआवजा दिया जाए जिस से उनके मानसिक और वित्तीय कष्ट की कुछ भरपाई हो| एयरलाइंस के सीईओ और बोर्ड में किस स्तर पर इस बारे में कोताही हुई और किस ने इस काम को नहीं किया, उस पर मुकदमा होना चाहिए| इस बात की भी जांच होनी चाहिए कि इस पूरी घटना में कोई मिली भगत तो नहीं है या कोई विदेशी शाजिश तो नहीं है |
एक विशेषज्ञ कमिटी को इस बात का भी अध्ययन करना चाहिए कि भारतीय वायु परिवहन इंडस्ट्री में किसी एक एयरलाइंस की इतनी बड़ी मार्केट पर कब्जा कैसे हो गया और एक एकाधिकार की स्थिति आई कैसे ? मार्केट रेगुलेटर और DGCA कर क्या रहे थे? भारत जहां उड़ान जैसे कार्यक्रम से अपने वायु परिवहन क्षेत्र का विकास और विस्तार कर रहा है वहीं यहां किसी एक कंपनी का इतना बड़ा एकाधिकार होना बहुत खतरे की घंटी है| ये इस क्षेत्र के विकास के लिए बाधक है और देश के लिए सामरिक खतरे की घंटी है| ये एयरलाइंस अपने फायदे के लिए देश के बुरे समय में देश को बंधक बना सकते हैं, देश की जनता से मनमाने दाम वसूल सकते हैं और एक अफरा तफरी फैला सकते हैं| इस पूरी घटना से देश की साख पर अंतरराष्ट्रीय जगत में किरकिरी को हुई ही साथ में इस सरकार के विकास के मॉडल पर भी एक सवालिया निशान लगा दिया है | भारतीय वायु परिवहन व्यापार में मांग बहुत है पर फिर भी पिछले कुछ वर्षों में कई कंपनियाँ बंद हो गई| पिछले दो सालों से मुख्यतः दो कंपनियां ही चल रही थीं| इस घटना के तुरंत बाद सरकार ने तीन नए एयरलाइंस को मंजूरी दी है| आखिर ये कैसे हो गया? क्या मंत्रालय किसी ऐसे घटना का इंतजार कर रही थी? मंत्रालय में मंत्री और उनके बाबुओं से ये सवाल तो किया जाना जरूरी है| ये भी देखने वाली बात है कि इन कंपनियों की मंजूरी तो दे दी गई है पर किसी कंपनी ने अभी तक कोई शुरू करने की तारीख या कार्यक्रम नहीं बताया है| क्या ये मंजूरी की घोषणा बस जनता को तुरंत शांत करने के लिए है और अब ये कंपनियां अपने हिसाब से जब तक समय लगे तब तक इन लाइसेंस को लेकर बैठी रहेंगी?
मोदी सरकार को इस घटना से चेतावनी लेनी चाहिए और कुछ सामरिक क्षेत्रों में रेगुलेटरों की कार्य प्रणाली और उनके कार्य प्रभाव का विश्लेषण किया जाना चाहिए| टेलीकॉम संचार क्षेत्र एक दूसरा ऐसा क्षेत्र है जहाँ बस कुछ कंपनी का एकाधिकार बढ़ता जा रहा है| टेलीकॉम व्यापार क्षेत्र में बहुत छोटी कंपनियां बंद हो गई और बस कुछ कंपनियों का अधिकार हो गया है| विगत समय में भारत में मोबाइल संचार में गुणवत्ता में गिरावट और दाम में उछाल आया है| सरकार को इस क्षेत्र में भी आगे बढ़कर कुछ कदम उठाने की जरूरत है जिस से इंडिगो आपदा जैसी स्थिति टेलीकॉम क्षेत्र में ना आए |
विकसित भारत के सपने बहुत अच्छे हैं, पर अगर हमने इंडिगो आपदा जैसी घटनाओं से नहीं सीखा तो विकसित भारत की यात्रा रास्ते में ही दुर्घटना ग्रस्त हो सकती है |





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