रामलला की नगरी अयोध्या में गूंजे ‘जय श्री राम’ और ‘जय गुरुदेव’ के जयकारे, पारमेष्ठि गुरु शक्ति पूर्णिमा महोत्सव में उमड़ा आस्था का महासैलाब
अयोध्या से विजय कुमार झा
निखिल मंत्र विज्ञान (अंतरराष्ट्रीय सिद्धाश्रम साधक परिवार) की ओर से रामलला की पवित्र और पावन नगरी अयोध्या के कारसेवकपुरम में जानकी घाट के समीप आयोजित द्विदिवसीय पारमेष्ठि गुरु शक्ति पूर्णिमा महोत्सव के दूसरे दिन आध्यात्मिक चेतना और भक्ति का अभूतपूर्व संगम देखने को मिला। पूरा परिसर ‘जय श्री राम’, ‘जय गुरुदेव’, ‘जय निखिल’ और ‘हर-हर महादेव’ के उद्घोष से गुंजायमान रहा। देश-विदेश के कोने-कोने से पधारे हजारों-हजार साधक-साधिकाओं की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम को अलौकिक बना दिया। बुधवार देर रात तक चले इस शिविर में जहां साधना संपन्न कराई गईं, वहीं सद्गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली जी महाराज ने साधकों को दिव्य गुरुदीक्षा एवं शक्तिपात दीक्षाएं भी प्रदान कीं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में नए श्रद्धालु निखिल परिवार के सदस्य बने।
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30 पीढ़ियों का धैर्य और शौर्य है राम मंदिर: सद्गुरुदेव नंदकिशोर
परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंदजी महाराज (डॉ.नारायण दत्त श्रीमाली) एवं वंदनीया माता भगवती की दिव्यतम छत्रछाया में आयोजित इस शिविर में सद्गुरुदेव ने भगवान श्रीराम, गुरु-तत्व और रामलला की नगरी अयोध्या की महिमा का बखान किया। सद्गुरुदेव श्री श्रीमाली ने कारसेवकपुरम की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का स्मरण कराया।

उन्होंने कहा कि आज हम जिस पावन भूमि पर बैठकर साधना और दर्शन का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं, वह 500 वर्षों के अनवरत संघर्ष और लगभग 30 पीढ़ियों के अतुलनीय शौर्य तथा धैर्य का परिणाम है। उन्होंने चंपत राय के साथ हुई वार्ता का उल्लेख करते हुए बताया कि 92-93 में मात्र नाममात्र के मूल्य पर खरीदी गई इस भूमि से शुरू हुआ शिला-तराशने का कार्य और तीन दशकों की कानूनी लड़ाई के बाद आज भव्य राम मंदिर के रूप में साकार हुआ है। यह दृढ़ विश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण है। सद्गुरुदेव ने सचेत करते हुए कहा कि राम मंदिर का निर्माण पूर्ण विजय नहीं है। असली चुनौती अब शुरू होती है। अब युद्ध तलवारों, भालों या बंदूकों से नहीं, बल्कि विचारों से लड़े जाएंगे। हमारी पीढ़ी का परम कर्तव्य है कि वह विचारों के इस संग्राम में सनातन संस्कृति की ध्वजा को पूरे आर्यावर्त में पुनः मजबूती से स्थापित करे। 1600-1700 ईस्वी में विश्व की जीडीपी का 35 प्रतिशत हिस्सा भारत का था, क्योंकि हमारा साम्राज्य धर्म और ‘सर्वजन हिताय’ के भाव पर टिका था। हमें उसी रामराज्य की भावना को पुनः स्थापित करना है।
दुखों से न झुकने वाली समर्थता देना ही गुरु का कार्य
गुरु तत्व की गूढ़ व्याख्या करते हुए सद्गुरुदेव ने स्पष्ट किया कि गुरु का कार्य केवल व्यावहारिक सलाह देना या समस्याओं को तात्कालिक रूप से हल करना नहीं है। गुरु का वास्तविक कार्य शिष्य को इतना आत्म-समर्थ बनाना है कि जीवन का कोई भी दुख या संकट उसे डिगा न सके, झुका न सके। उन्होंने अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की यात्रा का वर्णन करते हुए कहा कि संसार का सामान्य मनुष्य बाहरी आवरणों, वस्त्रों और भौतिक सुख-सुविधाओं में उलझा रहता है। सुख केवल भौतिक संसाधनों का नाम है, जबकि आनंद अंतर्मन का वह खजाना है जिसका बाह्य परिस्थितियों से कोई लेना-देना नहीं होता। गुरु शिष्य के प्राणों के माध्यम से उसके मन में प्रवेश करते हैं और अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित करते हैं। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी के कथनों को उद्धृत करते हुए उन्होंने कहा कि छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता और टूटे पैर से कोई खड़ा नहीं होता। गुरु शिष्य को बड़ा पद देने नहीं, बल्कि उसका मन बड़ा करने आते हैं, क्योंकि बड़ा मन ही क्षमा, प्रेम, बड़े निर्णय और लक्ष्य-सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
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बुद्धि, विवेक और निष्काम समर्पण के साक्षात प्रतीक हैं श्री हनुमान

रामकथा और हनुमान जी के प्रसंगों का सुंदर समन्वय करते हुए सद्गुरुदेव ने कहा कि हनुमान जी केवल शारीरिक बल के धाम नहीं थे, बल्कि वे तर्क, विचार और परम बुद्धि के स्वामी थे। जब लंका से लौटने पर श्री राम ने सीता जी के कुशल-क्षेम के विषय में पूछा, तो हनुमान जी ने अपनी चतुर वाणी में कहा—
नाम पहरू दिवस निसि ध्यान तुम्हारा कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्राण केहि बाट।।
अर्थात, आपके नाम का पहरा और आपके ध्यान का किवाड़ इतना सुदृढ़ है कि माता सीता के प्राण बाहर निकल ही नहीं सकते। हनुमान जी ने बातों-बातों में प्रभु राम को बोध कराया कि अपने अनन्य भक्तों की रक्षा की जिम्मेदारी स्वयं भगवान की होती है। उन्होंने रावण वध के प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे हनुमान जी ने अपनी विलक्षण बुद्धि के बल पर रावण के महल से ही उसका ब्रह्मास्त्र हासिल कर प्रभु राम को सौंपा। बल से सदैव बुद्धि बड़ी होती है और बुद्धि मन के शुभ भावों से जागृत होती है।
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दृष्टिकोण का परिवर्तन ही जीवन का असली आनंद
सद्गुरुदेव ने एक दृष्टांत के माध्यम से समझाया कि समस्या पैसों या परिस्थितियों की नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि की होती है। जो हमारे पास उपलब्ध है, हम उसका आनंद लेने के बजाय अप्राप्त के पीछे भागते रहते हैं। प्रतिदिन प्रातः उठते ही अपनी श्वासों, अपने शरीर और जीवन के प्रति ईश्वर का कृतज्ञता ज्ञापन करना ही आनंद प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग है। उन्होंने बीती बातों को बिसारकर आगे बढ़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि 10-20 साल पुराने मुकदमों और कड़वी यादों को भूलकर आज से ही दोगुनी गति से जीवन की नई शुरुआत करनी चाहिए।
जीवन एक अनवरत संग्राम है, रण से भागना अज्ञानता है

सद्गुरुदेव ने साधकों को कर्मयोगी बनने का आह्वान किया। उन्होंने प्रेरक काव्य पंक्तियों के माध्यम से जीवन के यथार्थ को प्रकट किया –
युद्ध नहीं जिनके जीवन में, वे भी बहुत अभागे होंगे।
या तो प्रण को तोड़ा होगा, या फिर रण से भागे होंगे॥
दीपक का कुछ अर्थ नहीं, जब तक वह तम से न लड़ेगा।
दिनकर नहीं प्रभा बांटेगा, जब तक वह स्वयं न धधकेगा॥
उन्होंने स्पष्ट किया कि महाभारत में पांडवों ने 13 वर्षों की प्रताड़ना के बाद केवल 5 गाँव माँगे थे, परंतु जब न्याय नहीं मिला तो 18 दिनों के कुरुक्षेत्र युद्ध में पूरी समस्या का समाधान कर धर्म साम्राज्य की स्थापना की गई। राजा हरिश्चंद्र, श्री राम, माता सीता और महाराणा प्रताप से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज तक सभी को अपने जीवन में संघर्ष का संग्राम स्वयं लड़ना पड़ा।सद्गुरुदेव ने आगे कहा कि जीवन में संघर्ष अनिवार्य है, परंतु साधक कभी अकेला नहीं होता; गुरु की सूक्ष्म चेतना और दिव्य आशीर्वाद हर संग्राम में उसके साथ रहता है। पराजय के भय से कर्मपथ को छोड़ना कायरता है। महोत्सव का समापन गुरु आरती, महाप्रसाद वितरण और सद्गुरुदेव जी के दिव्य आशीर्वाद के साथ हुआ। शिविर के दौरान प्रसिद्ध भजन गायक महेंद्र मानकर एवं उनकी मंडली के कलाकारों ने एक से बढ़कर एक भक्तिमय भजनों की प्रस्तुति देकर संपूर्ण वातावरण को आनंदमय और गुरुमय बना दिया। मंच का कुशल संचालन मनोज भारद्वाज ने किया।
- Varnan Live Report.




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