दो दिन बाहर रहने की है खास मान्यता, बोकारो में बाहुड़ा यात्रा की रही धूम
संवाददाता
बोकारो। बोकारो इस्पात नगर में शुक्रवार को भगवान जगन्नाथ, बहन सुभद्रा और भ्राता बलभद्र की प्रसिद्ध बाहुड़ा यात्रा (वापसी रथयात्रा) अत्यंत भव्य, गरिमामय और भक्तिमय माहौल में संपन्न हुई। पूरा नगर ‘जय जगन्नाथ’, ‘हरे कृष्णा’, ‘हरि बोल’ और शंखध्वनि के गूंजते जयकारों से सराबोर हो उठा। वैदिक मंत्रोच्चार और विधिवत पूजा-अर्चना के बाद प्रभु की पवित्र देव प्रतिमाओं को जगन्नाथ मंदिर प्रांगण से लाकर नयनभिराम सुसज्जित रथ पर विराजमान किया गया। प्राचीन सनातनी परंपरा का निर्वहन करते हुए अधिशासी निदेशक (सामग्री प्रबंधन) ने रथ की सफाई की पवित्र रस्म ‘छेरा-पन्हारा’ पूरी निष्ठा के साथ संपन्न की। इस अलौकिक क्षण के साक्षी बनने के लिए बोकारो महिला समिति की सदस्याएं, वरिष्ठ अधिकारी और हजारों की संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। जनवृत्त-1 स्थित ऐतिहासिक राम मंदिर परिसर से शुरू होकर पत्थरकट्टा चौक, गांधी चौक और बीजीएच मार्ग होते हुए यह विशाल रथयात्रा वापस जगन्नाथ मंदिर पहुंची, जहां भक्तों ने प्रभु के रथ की रस्सियों को खींचकर पुण्य लाभ अर्जित किया।
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रथ के वापस मंदिर पहुंचने के बाद भी भक्तों के मन में सबसे बड़ा कौतूहल इस बात को लेकर है कि आखिर भगवान अपने घर लौटने के बाद भी दो दिनों तक मंदिर के अंदर प्रवेश क्यों नहीं कर पाते? इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प और मीठी पौराणिक मान्यता छिपी हुई है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ देवी लक्ष्मी को बिना बताए अपनी मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) चले गए थे, तो मां लक्ष्मी उनसे बेहद रुष्ट हो गईं। पति के बिना बताए घर से चले जाने के कारण उनका गुस्सा इतना बढ़ गया कि जब भगवान नौ दिनों बाद मौसीबाड़ी से वापस अपने धाम लौटे, तो देवी लक्ष्मी ने गुस्से में आकर मंदिर का मुख्य द्वार बंद कर दिया!
मां लक्ष्मी की इसी नाराजगी और ‘गृह-कलह’ के कारण भगवान जगन्नाथ को दो दिनों तक अपनी बहन और भाई के साथ मंदिर के बाहर रथ पर ही गुजारने पड़ते हैं। वे मंदिर के मुख्य द्वार पर ही विराजमान होकर अपनी रूठी हुई पत्नी (मां लक्ष्मी) को मनाते हैं और भक्तों को दर्शन देते हैं। दो दिनों तक मनावन और विशेष रस्मों के बाद ही उन्हें मंदिर के भीतर जाने की अनुमति मिलती है। यह अनूठी परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है।
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वर्ष 2001 से जारी है बोकारो में यह अटूट धार्मिक परंपरा
बोकारो में वर्ष 2001 से श्री जगन्नाथ रथयात्रा का यह भव्य आयोजन बोकारो इस्पात संयंत्र (BSL) द्वारा निरंतर किया जा रहा है। इस साल बीते 16 जुलाई को भगवान जगन्नाथ अपनी मौसीबाड़ी पधारे थे और अब शुक्रवार को उनकी वापसी हुई है।
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दशकों से चली आ रही यह परंपरा न केवल शहर के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने को मजबूती देती है, बल्कि आपसी सौहार्द, अटूट एकता और निस्वार्थ सेवा भावना का अनूठा उदाहरण भी पेश करती है। दो दिनों तक चलने वाले इस विशेष दर्शनोत्सव को लेकर बोकारो के श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखा जा रहा है।
- Varnan Live Report.




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