देश को एक और अपूरणीय क्षति दे गये जेटली

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अभी देशवासी विदुषी महिला नेता सुषमा स्वराज के निधन के मातम से उबर भी नहीं पाये थे कि एक और बड़ी और अपूरणीय क्षति हो गयी। भाजपा के कद्दावर नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री अरुण जेटली चल बसे। उनका एम्स में निधन हो गया। 66 वर्ष की अवस्था में उन्होंने एम्स में अंतिम सांस ली। बीते नौ अगस्त को उन्हें भर्ती कराया गया था और कई क्षेत्रों के वरिष्ठ चिकित्सकों का दल उनका इलाज कर रहा था। कई दिनों से वह जीवन रक्षक प्रणाली पर टिके थे और उनकी हालत स्थिर होने की बातें सामने आ रही थीं। लेकिन, देश के विकास में अहम योगदान देने वाले सरकार के मददगार और एक कुशल एवं अत्यंत विद्वान यह राजनीतिज्ञ हमेशा-हमेशा के लिये अविस्मरणीय यादें छोड़ चल गये। जेटली पेशे से वकील थे और भाजपा सरकार के पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंत्रिमंडल में उनकी अहम भूमिका रही। उन्होंने वित्त और रक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभाला और कई बार सरकार के लिए संकट मोचक भी साबित हुए। बीमारी के कारण जेटली ने 2019 लोकसभा चुनाव नहीं लड़ने का फैसला किया था। इस साल मई में भी उन्हें इलाज के लिए एम्स में भर्ती कराया गया था। गत वर्ष 14 मई को उनके गुर्दे का प्रतिरोपण हुआ था। उस समय रेलवे मंत्री पीयूष गोयल ने उनके वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला था। गत वर्ष अप्रैल से ही उन्होंने अपने कार्यालय आना बंद कर दिया था। बीमारी को मात देकर 23 अगस्त 2018 को उन्होंने दोबारा वित्त मंत्रालय का कार्यभार संभाला था। मधुमेह की बीमारी के चलते वजन बढ़ने के कारण सितम्बर 2014 में उनकी बेरिएट्रिक सर्जरी भी हुई थी।
तीन दशक से बने रहे पसंदीदा
जानकारों के अनुसार भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता रहे अरुण जेटली के लिए राजनीतिक हलकों में अनौपचारिक तौर पर माना जाता था कि वह पढ़े लिखे विद्वान मंत्री हैं। पिछले तीन दशक से अधिक समय तक अपनी तमाम तरह की काबिलियत के चलते जेटली लगभग हमेशा सत्ता तंत्र के पसंदीदा लोगों में रहे, सरकार चाहे जिसकी भी रही हो। सौम्य, सुशील, अपनी बात स्पष्टता के साथ कहने वाले और राजनीतिक तौर पर उत्कृष्ट रणनीतिकार रहे जेटली भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए मुख्य संकटमोचक थे, जिनकी चार दशक की शानदार राजनीतिक पारी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के चलते समय से पहले समाप्त हो गई। हर जटिल मसले पर सर्वसम्मति बनाने में महारत प्राप्त जेटली को कुछ लोग मोदी का आॅरिजनल चाणक्य भी मानते थे जो 2002 से मोदी के लिए मुख्य तारणहार साबित होते रहे जब तत्कालीन मुख्यमंत्री पर गुजरात दंगे के काले बादल मंडरा रहे थे।
संकट में रहे मददगार
जेटली न सिर्फ मोदी, बल्कि अमित शाह के लिए भी उस वक्त में मददगार साबित हुए, जब उन्हें गुजरात से बाहर कर दिया गया था। शाह को उस वक्त अक्सर जेटली के कैलाश कॉलोनी दफ्तर में देखा जाता था और दोनों हफ्ते में कई बार साथ भोजन करते देखे जाते थे। 2014 में मोदी को भाजपा के प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने की औपचारिक घोषणा से पहले के कुछ महीनों में, जेटली ने राजनाथ सिंह, शिवराज सिंह चौहान और नितिन गडकरी को साथ लाने के लिए पर्दे के पीछे बहुत चौकस रह कर काम किया। प्रशिक्षण से वकील रहे जेटली अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री थे और जब मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने अरुण शौरी और सुब्रमण्यम स्वामी की दावेदारी को अनदेखा करते हुए उन्हें वित्त मंत्रालय का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा। मोदी एक बार जेटली को अनमोल हीरा भी बता चुके हैं। सरकार में जेटली की उपयोगिता का अंदाज इससे लगाया जा सकता था कि जब तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर की सेहत बिगड़ी तो उन्हें ही मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया।
मोदी के भरोसेमंद
सत्ता संचालन के दांव पेंच से भली-भांति परिचित जेटली 1990 के दशक के अंतिम सालों के बाद से नयी दिल्ली में मोदी के भरोसेमंद बन चुके थे और बीते कुछ सालों में, खासकर गुजरात में 2002 के दंगों के बाद, अदालती मुश्किलों को हल करने वाले कानूनी दिमाग से आगे बढ़कर वह उनके मुख्य सलाहकार, सूचना प्रदाता और उनके प्रमुख पैरोकार बन चुके थे। अपने बहुआयामी व्यक्तित्व, अनुभव और कुशाग्रता के चलते मोदी सरकार के पहले कार्यकाल (2014 से 2019) में जेटली लगभग हर जगह छाए रहे। सरकार की उपलब्धियां गिनाने का मामला हो या सरकार के विवादित फैसलों के बचाव का या फिर विपक्ष पर आक्रामक हमला बोलने की बात हो या 2019 के चुनाव अभियान के लिए ‘स्थिरता या अव्यवस्था के बीच चुनने की परीक्षा’ का विमर्श तय करना हो, जेटली की भूमिका हर मामले में महत्वपूर्ण थी। देश और दुनिया के लिए उन्होंने ईंधन की बढ़ती कीमतों का वैश्विक संदर्भ समझाया, जटिल राफेल लड़ाकू विमान सौदे को आसान शब्दों में बताया, माल एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसे बड़े आर्थिक कानून को संसद की मंजूरी दिलवाई जो करीब दो दशकों से लटका हुआ था। मोदी और जेटली का साथ बहुत पुराना है जब आरएसएस प्रचारक, मोदी को दिल्ली में 90 के दशक के अंतिम में भाजपा का महासचिव नियुक्त किया गया था, वह 9 अशोक रोड के जेटली के आधिकारिक बंगले के एक कमरे में रहते थे। उस वक्त जेटली अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री थे।
सबसे युवा अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल
विभाजन के बाद लाहौर से भारत आए एक सफल वकील के बेटे जेटली ने कानून की पढ़ाई की थी। जब देश में आपातकाल लागू हुआ तब वह दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष थे। विश्वविद्यालय परिसर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित करने की सजा उन्हें 19 महीने जेल में रह कर काटनी पड़ी। आपातकाल हटने के बाद उन्होंने वकालत शुरू की और 1980 में दिल्ली के तत्कालीन उपराज्यपाल द्वारा इंडियन एक्सप्रेस की इमारत को गिराने के फैसले को चुनौती दी। इस दौरान वह रामनाथ गोयनका, अरुण शौरी और फली नरीमन के संपर्क में आए। इसी दौरान उन पर विश्वनाथ प्रताप सिंह की नजर पड़ी जिन्होंने प्रधानमंत्री बनने के बाद जेटली को अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल नियुक्त किया। वह इस पद पर काबिज होने वाले सबसे युवा व्यक्ति थे। उनका निधन वास्तव में देश को एक अपूरणीय क्षति है।
Rupak Jha.
– For Varnan Live.

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