Editorial- कोनार नहर पर भ्रष्टाचार का कहर

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केन्द्र की मोदी सरकार ने आज देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। राजनीति के बड़े-बड़े सूरमा भ्रष्टाचार के आरोप में सलाखों के पीछे धकेले जा रहे हैं। झारखंड में भी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के दस्ते द्वारा घूसखोर अधिकारी जगह-जगह पकड़े जा रहे हैं। लेकिन, भ्रष्टाचार ने अपनी जड़ें इतनी गहराई तक मजबूत कर ली है कि उसे उखाड़ फेंकना आसान नहीं दिखता। बड़ी-बड़ी योजनाओं पर सरकार करोड़ों रुपये खर्च तो करती है, लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूब चुकी व्यवस्था और इसी व्यवस्था के अंग बने अधिकारियों व ठेकेदारों की लम्बी फौज की कार्यशैली से इन योजनाओं की गुणवत्ता पर अक्सर सवाल खड़े होते रहे हैं। झारखंड के तीन जिलों क्रमश: हजारीबाग, गिरिडीह और बोकारो के बड़े भू-भाग में सिंचाई की बेहतर सुविधा उपलब्ध कराने तथा किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की सोच के तहत निर्मित कोनार नहर परियोजना की बांध इसके उद्घाटन के 12 घंटे बाद ही टूटकर बह गयी। लगभग 2176.25 करोड़ रुपये की लागत से निर्मित उत्तरी छोटानागपुर की इस बहुप्रतीक्षित परियोजना का उद्घाटन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने 28 अगस्त को किया था। अगले दिन नहर में पानी छोड़ा गया, लेकिन कमजोर निर्माण के कारण महज 12 घंटे बाद ही बगोदर प्रखंड अंतर्गत कुसमरजा गांव के पास लगभग 100 फीट के हिस्से में नहर की बांध टूट गयी और कई गांवों में पानी घुस गया। लगभग 100 एकड़ में लगी धान, मकई और मूंगफली की फसलें बर्बाद हो गयीं।

संयोग अच्छा था कि आसपास के इलाके में घर नहीं थे। अगर वही बांध 150 मीटर पहले टूटती तो भारी तबाही मचती और जन-माल का बड़ा नुकसान होता। अगले दिन अहले सुबह ग्रामीणों ने खुद इन्टेक गेट बंद कर पानी की रफ्तार को रोका। यहां आश्चर्य की बात यह रही कि जल संसाधन विभाग के अपर मुख्य सचिव ने बगैर जांच किये ही घटना का कारण मिट्टी के बांध में चूहों द्वारा बिल खोदना बता दिया। पर, जब विभागीय मंत्री के आदेश पर 24 घंटे के अन्दर जांच हुई और विभाग के मुख्य अभियंता हेमंत कुमार ने अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह को जांच रिपोर्ट सौंपी तो उसमें चूहों को क्लीनचिट दे दी गयी और इसके लिए चार अभियंताओं को दोषी पाया गया। रिपोर्ट आने के बाद विभागीय मंत्री रामचंद्र सहिस ने चारों अभियंताओं को निलंबित करने का आदेश दिया। रिपोर्ट में घटना का कारण ओवरफ्लो के साथ ही अभियंताओं की लापरवाही बताया गया। जानकर बताते हैं कि कुसमरजा गांव के पास जब नहर बन रही थी तो वहां करीब 10 फीट का गड्ढा था। वहां मिट्टी की भराई मजबूती के साथ नहीं की गयी। रोड रोलर चलाकर मिट्टी का समतलीकरण नहीं किया गया। इसी कारण यह हिस्सा कमजोर रह गया और पानी के तेज बहाव को नहीं झेल पाया। लिहाजा कच्ची बांध ध्वस्त हो गयी।

इससे इतना तो साफ हो गया है कि इस परियोजना के निर्माण में अनियमितता बरती गयी है। दरअसल, कोनार सिंचाई परियोजना की आधारशिला वर्ष 1978 में बिहार के तत्कालीन राज्यपाल जगन्नाथ कौशल ने रखी थी। प्रारंभिक दौर में बड़े ही तामझाम के साथ काम की शुरुआत हुई। इस परियोजना को पांच वर्षों में पूरी करनी थी, लेकिन विभागीय उदासीनता और ठेकेदारों की लापरवाही के कारण 36 वर्षों तक यह परियोजना लटकी रही। वर्ष 2014 में पुन: काम प्रारम्भ हुआ और लगभग 12 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली इस परियोजना की लागत 2576.25 करोड़ तक पहुंच गई। पांच वर्षों में काम कथित रूप से पूरा हुआ, लेकिन उद्घाटन के महज 12 घंटे बाद ही बांध के ध्वस्त हो जाने की घटना ने इसकी गुणवत्ता पर सवाल जरूर खड़े कर दिये हैं। पूरे मामले की जांच होगी या नहीं, यह तो सरकारी स्तर पर ही तय हो सकता है, लेकिन प्रथम दृष्टया इतना तो कहा ही जा सकता है कि कोनार नहर पर भ्रष्टाचार का कहर भारी पड़ा है!

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