नये ट्रैफिक नियम, खाकी गुंडई और जनोद्वेलन

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दीपक कुमार झा
कहते हैं पुलिस समाज का रक्षक होती है। होना भी चाहिए। आखिर खाकी वर्दी पहनते वक्त पुलिस वाले कसमें भी यही खाते हैं कि पूरी निष्ठा के साथ वे बिना किसी स्वार्थ के जनता की सेवा करेंगे। केंद्र सरकार ने सड़क हादसों में लगातार बढ़ती मौतों की संख्या को गंभीरता से लेते हुए नए यातायात नियमों को लागू तो कर दिया, लेकिन इसकी आड़ में शायद इन दिनों कुछ और ही हो रहा है।

जो स्थिति है, वह अमूमन हर दिन सोशल मीडिया पर वायरल होती देखी जा रही है। नए ट्रैफिक नियमों को लागू करने के बहाने पुलिस और आमजनों की सीधी भिड़ंत वाली स्थिति आए दिन सामने आ रही है। कहीं परेशान लोग पुलिस के साथ बहस करते देखे जाते हैं, तो कहीं नोक-झोंक की घटनाएं सामने आती हैं। बहसबाजी और हल्की नोक-झोंक तक तो ठीक है, लेकिन जब नियमों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के बहाने पुलिस की बर्बरता और बढ़ जाए, तो इसे घोर दुर्भाग्यपूर्ण ही कहेंगे और दुर्भाग्यवश इन दिनों पूरे देश में ऐसा ही आलम बना हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो इसे लेकर पूरे देश में एक अलग ही माहौल बन गया है और स्थिति कमोवेश विस्फोटक सी हो चली है। कहीं किसी को बुजुर्ग के साथ मारपीट होती है तो कहीं छोटी बच्ची के बाल-मन पर अपने चाचा के साथ मारपीट का गहरा आघात पहुंचता है। पहले से ही वर्दी वाले गुंडे के रूप में बदनाम पुलिस की राक्षसवृत्ति हाल ही में यूपी के सिद्धार्थनगर में सामने आयी। जो मंजर रहा, उसे देखते हुए तो यही कहा जाएगा कि जनता की यह आह आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए दुखदायी साबित हो सकती है। वहां एक युवक कथित तौर पर बिना हेलमेट का पकड़ा जाता है। पुलिस अगर चाहती तो उसे केवल चालान काटकर छोड़ सकती थी, लेकिन जिस बर्बरता के साथ पुलिस वालों ने मिलकर उक्त युवक की बेरहमी से जांघ में दबा-दबा कर पिटाई की, वह अपने आप में दरिंदगी की पराकाष्ठा ही कही जायेगी। पास में खड़ी उस युवक की नन्हीं भतीजी इधर से उधर भागती फिरती है और अपने चाचा को बचाने के लिए पुलिस वालों से मिन्नतें करती है- ‘पुलिस अंकल मेरे चाचा को छोड़ दीजिए, प्लीज! लेकिन, वे तो इतने निष्ठुर थे कि उस मासूम गुहार का भी उन पर कोई असर न पड़ा और उसे पीटते ही रहे। हालांकि, बाद में वीडियो वायरल होने और मीडिया के जरिए मामला सामने आने पर दोनों आरोपी पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया। लेकिन, सवाल यह है कि आखिर ये कैसा कानून है, जो पुलिस को निरीह जनता को इस कदर सरेआम पीटने और उसकी सामाजिक छवि को तार-तार करने का अधिकार देती है। जाहिर है, यह कोई कानून नहीं, बल्कि चंद बर्बर एवं कठोरहृदयी खाकी वर्दीधारियों की गुंडई ही है। इन्हीं चंद पुलिस वालों के चलते आज देश में पुलिस की छवि आम जनता के बीच बेहद खराब हो चली है। स्थिति यह है कि आम आदमी अपने साथ किसी घटना के बाद भी थाने का चक्कर काटने से डरता और घबराता है। उनके आला अधिकारी जनमैत्री की दुहाई देते हैं और समय-समय पर निर्देश भी देते हैं, लेकिन जिनका चरित्र ही क्रूर हो चुका है, उनमें शायद आज के कलियुग में बदलाव की आस भी बेमानी है। सरकार को चाहिए कि वह कानून की आड़ लेकर ऐसे संवेदनहीन पुलिस पदाधिकारियों पर सख्त से सख्त कार्यवाही करे, ताकि ऐसी अमानवीय घटनाओं पर रोक लग सके। पुलिस जब जनता को विश्वास में लेकर सद्भाव से अपना काम करेगी तो ही किसी भी तरह के कानून को सफल बनाने में या फिर समाज को अपराधमुक्त बनाने में जनता उसका साथ दे सकेगी और जब ऐसा होगा, तभी किसी नियम अथवा अधिनियम की सार्थकता सिद्ध होगी।

 

स्मार्ट पुलिसिंग और जन-जागरुकता पहले

नये ट्रैफिक नियमों में सरकार ने हर गलतियों के लिए जुर्माने की राशि को लगभग 10 गुना बढ़ा दी है। यही वजह है कि देश के अलग-अलग हिस्सों से भारी-भरकम जुमार्ना की राशि पुलिस वसूल रही है और लोगों का आक्रोश सामने आ रहा है। सरकार के खिलाफ लोगों में खूब नाराजगी है। लेकिन, सच्चाई यह है कि ट्रैफिक नियम हमारे लिए ही है। हम अगर दोपहिया वाहन पर हेलमेट न पहने तो हमारी ही जान-माल का नुकसान हो सकता है। बाइक से हम गिर जाएं तो हमारे सिर में चोट लगने की संभावना बनी रहती है और हम जानते हैं कि सिर में चोट लगने से जान जाने की कितनी संभावना है। यही वजह है कि सड़क हादसों में दोपहिया वाहन-सवारों की मरने की संख्या बहुत ज्यादा है। इसी प्रकार कार में सीट बेल्ट भी उतना ही जरूरी है, जितना कि बाइक पर हेलमेट। सीट बेल्ट हमें किसी भी तरह के झटकों से बचाता है। अब यहां विडंबना यह है कि देश में मध्यवर्गीय लोगों की तादाद सर्वाधिक है, परंतु नये यातायात नियमों में आमलोगों के बजट का ख्याल नहीं रखा गया। वे सीमित आमदनी में अपना जीवन-यापन चलाते हैं। गलतियां तो किसी से भी हो सकती हैं, लेकिन यह भारी-भरकम जुर्माना लोगों के जीवन में भारी-भरकम परेशानियां ज्यादा बन रही है। दरअसल, इस नियम को लागू करने से पहले एक बड़ी आवश्यकता थी, जो नहीं किया गया। इस तरह के जुर्माने लिए पहले स्मार्ट पुलिसिंग और व्यापक जन-जागरुकता की जरूरत थी। अगर कोई बाइक सवार बिना हेलमेट का पकड़ा जाता है तो उसे तत्काल On the Spot हेलमेट खरीदवाया जाय, जिसकी गाड़ी का इंश्योरेन्स या पॉल्युशन सर्टिफिकेट नहीं है, वहीं तत्काल दिलवाने की व्यवस्था हो। बदले में सरकार उससे उसका खर्च ले ले। इससे कम से कम एक लाभ तो यह होगा कि देशभर में अधिकाधिक गाड़ियों के वैधानिक कागजात दुरुस्त हो जायेंगे और जन-जागरुकता भी आयेगी। लेकिन, अफसोस यह कि ऐसा नहीं हो रहा है। ऐसे में जब कई राज्य की सरकारों ने कुछ महीने की छूट दे रखी है, उस अवधि में अपने दस्तावेज पुख्ता करना ही विवशता है।

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