कल तक थे साथ-साथ, अब लड़ेंगे दो-दो हाथ : गठबंधन टूटे, पुराने साथी छूटे

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विजय कुमार झा
रांची :
जिसका डर था, वही हुआ। आसन्न विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारी को लेकर टिकट की जीच ने ऐसा रंग दिखाया कि सियासी उथल-पुथल के पिछले तमाम रिकॉर्ड धराशायी हो गए। टिकट ने ऐसी विकट स्थिति ला दी कि कल के पुराने सियासी दोस्त, आज के प्रतिद्वंद्वी बन आमने-सामने दो-दो हाथ करने को खड़े हो चुके हैं। क्या एनडीए और क्या यूपीए, सबकी गांठें खुलकर अलग-थलग पड़ गईं। हालांकि, इसके लक्षण पहले से ही दिख रहे थे। सत्तोलोलुपता चीज ही ऐसी है कि अच्छे-अच्छों का धैर्य जवाब दे जाता है। दे भी क्यों न! भाई लोकतंत्र में सबको अपनी भागीदारी का अधिकार है, लेकिन जब बात साथ निभाने के संकल्प की रही हो, वह अगर अवसरवादिता की बलिवेदी पर शहीद हो जाय तो इसे विडम्बना ही कहेंगे और ऐसा ही हुआ। टिकट को लेकर आपसी सहमति नहीं बन पाने के साथ-साथ अपने राजनीतिक वर्चस्व की अंदरूनी लड़ाई में 19 साल पुराना भाजपा और आजसू का सियासी याराना भी आखिरकार टूट गया। वहीं दूसरी तरफ यूपीए में झाविमो ने किनारा पकड़ते हुए अपनी डफली अलग ही बजाने का निर्णय लिया। लिहाजा, राज्य में यूपीए महागंठबंधन कांग्रेस, झामुमो और राजद तक का ही होकर रह गया है। हालांकि, इनके आपसी समझौते के बावजूद कई विधानसभा सीटों में उम्मीदवारी को लेकर भीतर ही भीतर बगावती स्वर भी उठते दिख रहे हैं। नतीजा क्या होता है, यह देखना बाकी है। फिलहाल, टिकट की आस में इधर से उधर और उधर से इधर दल-बदल का सिलसिला लगातार जारी है।

80 सीटों पर लड़ेगी भाजपा
81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा ने अकेले 80 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है, जबकि एक सीट पर वह अपना समर्थन देगी। भाजपा राज्य की कुल 81 विधानसभा सीटों में से 53 प्रत्याशियों की सूची जारी कर चुकी है, जबकि आजसू पार्टी ने भी 12 प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। आजसू के केन्द्रीय अध्यक्ष सुदेश महतो ने कहा है कि उनकी तैयारी 26 सीटों पर है।

सेंधमारी की चुनौती
राहें अलग होने के बाद भाजपा और आजसू के समक्ष अपना गढ़ बचाने व दूसरे के गढ़ में सेंधमारी की चुनौती होगी। आजसू प्रमुख सुदेश महतो, सांसद चन्द्रप्रकाश चौधरी, भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुआ, मुख्यमंत्री रघुवर दास समेत कई नेताओं को अब अपने बल पर लड़ने के साथ ही भाजपा को प्रतिद्वंद्वी के रूप में लेकर रणनीति बनानी होगी

नहीं झुकेगी भाजपा
सूत्रों के अनुसार भाजपा ने गठबंधन में सहयोगी दलों के सामने नहीं झुकने का निर्णय ले लिया है। सूत्रों ने बताया कि झारखंड के मुद्दे पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और उपाध्यक्ष सह झारखंड के चुनाव प्रभारी ओपी माथुर ने बैठक की और यह निर्णय लिया कि पार्टी सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी। गठबंधन टूटने के बाद भाजपा के लिए 65 प्लस के लक्ष्य के विपरीत 42 सीटें जीतना अहम माना जा रहा है।

दबाव की राजनीति
दरअसल, गठबंधन में आजसू प्रमुख सुदेश महतो दबाव की राजनीति शुरू कर चुके थे। पार्टी की पहली सूची जारी कर भाजपा की सीटों पर उम्मीदवार देकर उन्होंने पहला दबाव बनाया। उसके बाद हर दिन एक-एक हैवीवेट नेताओं को पार्टी में शामिल कराते रहे। दूसरे दल से आने वाले नेताओं को उनकी पसंदीदा सीट दी जा रही है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप बलमुचू और छतरपर के भाजपा विधायक राधाकृष्ण किशोर तक आजसू का पट्टा धारण कर चुके हैं। यानी केले की मिठास भाजपा के लिए खटास बनने की तैयारी में लगी है।

जदयू, लोजपा भी अलग
आजसू से अलग होने वाली भारतीय जनता पार्टी अब झारखंड में अकेले नजर आ रही है। यही कारण है कि इस चुनाव में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन पूरी तरह बिखरा नजर आ रहा है। बिहार में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहा जनता दल (यू) जहां झारखंड में अकेले चुनावी मैदान में उतर गया है, वहीं राजग की घटक लोजपा ने भी सीट बंटवारे से नाराज होकर 50 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है।

– Varnan Live Report.

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