सोशल मीडिया से लेकर स्कूल परिसरों तक नाराज़गी, शिक्षाविदों ने जताई चिन्ता  

– D. K. Vats
Bokaro :
बोकारो सहित पूरे Jharkhand का शिक्षा जगत इन दिनों आहत दिख रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से लेकर स्कूल कैंपस तक चर्चाओं का बाजार गर्म है। वजह है स्कूलों के खिलाफ विरोध पर विरोध और कथित साजिशें। नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही निजी स्कूलों के खिलाफ आंदोलनों का जो दौर शुरू होता है, उसे जनहित से अधिक निहित स्वार्थ और राजनीतिक जमीन तैयार करने की मंशा के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में शहर के एक प्रतिष्ठित निजी विद्यालय की कैंटीन पर हुई विवादास्पद छापेमारी ने आग में घी डालने का काम किया है। राज्य के एजुकेशनल हब के रूप में विख्यात बोकारो की शैक्षणिक साख पर इस हमले के बाद शिक्षाविद गोलबंद होते दिख रहे हैं। उन्होंने इसे लेकर न केवल चिंता जताई, बल्कि इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए आक्रोश भी व्यक्त किया है। कहा कि जान बूझकर प्राइवेट स्कूलों को सॉफ्ट टारगेट बनाया जा रहा है।

लिस्ट उठाकर देख लीजिए, ‘निशाना’ बनाए जाने वाले स्कूलों से ही मिलेंगे टॉपर्स”
शिक्षाविद निजी स्कूलों के खिलाफ कथित साजिशों की एक स्वर में कड़ी निंदा कर रहे हैं। नगर के सेक्टर-5 स्थित एक बड़े स्कूल के प्राचार्य ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि टॉपर्स की लिस्ट उठाकर देख लीजिए, वहां आपको केवल इन्हीं ‘बहु-चर्चित’ और ‘निशाना बनाए जाने वाले’ निजी स्कूलों के मेधावी छात्र मिलेंगे, जिन्होंने बिना किसी बाहरी सहायता के बोकारो को शिक्षा का केंद्र बनाया। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों के मन में इन संस्थानों के प्रति एक नकारात्मक धारणा बनाने का प्रयास किया जा रहा है। धनबाद के एक नामचीन विद्यालय की प्राचार्या ने भी इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि झारखंड में जो हो रहा है वह समझ से परे है। समझ नहीं आता कि आखिर कौन और क्यों निजी स्कूलों को टारगेट कर रहा है? यह बहुत ही निंदनीय है। वहीं एक अन्य शिक्षाविद ने इसे प्रशासन का ‘पुअर शो’ बताते हुए कहा कि ऐसी हरकतें प्रशासनिक अधिकारियों की अपरिपक्वता को दर्शाती हैं। उन्हें अपने कार्यों में तार्किक और पारदर्शी होना चाहिए।

नया नहीं है ब्यूरोक्रेटिक और पॉलिटिकल दबाव
शिक्षाविद कहते हैं कि किताबों और ड्रेस के नाम पर उठने वाले विवादों की आड़ में कुछ तथाकथित प्रतिनिधि स्कूलों को डराने-धमकाने का काम करते रहे हैं। स्कूलों में एडमिशन के इस दौर में ब्यूरोक्रेटिक और पॉलिटिकल दबाव डालना कोई नई बात नहीं है, लेकिन किसी गुप्त ऑपरेशन के बहाने दमन की सीमाएं लांघना कहीं से भी उचित नहीं है। यह एक खतरनाक परिपाटी की शुरुआत है। विद्यालयों से जुड़े लोगों ने कहा कि आज यदि इस अन्याय पर चुप्पी साधी गई, तो कल शहर का हर शैक्षणिक संस्थान किसी न किसी रसूखदार की साजिश का शिकार होगा। बोकारो की शैक्षणिक गरिमा को तार-तार होने से बचाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर संवेदनशीलता और पारदर्शिता की नितांत आवश्यकता है।

जब महामहिम का ‘मेजबान’ अचानक बन गया ‘निशाना’
गौरतलब है कि हाल ही में जिस स्कूल की कैंटीन को पहले आनन-फानन में सील किया गया और 33 घंटे के भीतर ही खोल दिया गया, वह कुछ माह पहले ही फूड सेफ्टी क्लीयरेंस पा चुका था। चर्चा इस बात की है कि जिस कैंटीन ने मात्र कुछ समय पूर्व 14 नवंबर 2025 को राज्य के महामहिम राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार के आगमन पर उनके भोजन की जिम्मेदारी संभाली थी, वह अचानक कुछ ही महीनों में कथित तौर पर इतनी असुरक्षित कैसे घोषित कर दी गई? यही नहीं, स्वास्थ्य विभाग के जिस शीर्ष अधिकारी के कथित निर्देश पर यह कार्रवाई की गई, उनके बच्चे भी उसी कैंटीन में खाया करते थे और आज तक संयोगवश कभी कुछ गलत नहीं हुआ। बहरहाल, यह विरोधाभास क्या कहता है, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।

राष्ट्र-निर्माण के आधारस्तंभ हैं विद्यालय, खुंदक निकालने का जरिया नहीं : विकास कुमार

इस पूरे प्रकरण पर झारखंड-बिहार के प्रसिद्ध करियर काउंसेलर एवं वरिष्ठ शिक्षाविद विकास कुमार ने भी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा –

बोकारो को बोकारो बनाए रखने में BSL (बोकारो इस्पात संयंत्र) के बाद अगर किसी का सबसे बड़ा योगदान है, तो वह यहां के स्कूल हैं। ऐसे में स्कूलों पर अकारण दबाव बनाना न केवल इस शहर की पहचान को मिटाना है, बल्कि बोकारो की स्कूली शिक्षा व्यवस्था को अपूरणीय क्षति पहुंचाना है। निजी विद्यालय सियासी जमीन तैयार करने, निजी स्वार्थों की पूर्ति, विरोधों का केंद्र बनने या रंजिश निकालने का जरिया नहीं हैं, बल्कि वे राष्ट्र-निर्माण के प्रमुख आधारस्तंभ हैं। हाल के दिनों में जिस प्रकार बोकारो सहित पूरे झारखंड में निजी विद्यालयों को सॉफ्ट टारगेट बनाया जा रहा है, वह वास्तव में गहरी चिंता का विषय है। यह स्पष्ट रूप से संकेत देता है कि एक खास तरह का सिंडिकेट मिलकर सुनियोजित तरीके से इन संस्थानों को निशाना बना रहा है, जो हमारी शैक्षणिक समृद्धि के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।

Social Media की निरंकुशता बनी प्रोपेगेंडा का नया हथियार

शिक्षा जगत को आहत करने वाली इन साजिशों के बीच सोशल मीडिया की बेलगाम निरंकुशता आग में पेट्रोल डालने का काम कर रही है। अब सोशल मीडिया चैनलों और व्यक्तिगत पेजों के माध्यम से भ्रामक सूचनाओं का अंबार खड़ा किया जा रहा है। ऐसे तत्व जिनकी रसूखदारी काम न आई या जिनके व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति विद्यालयों से नहीं हो सकी, वे अब इन डिजिटल मंचों का उपयोग अपनी खुंदक निकालने के लिए कर रहे हैं। बिना किसी तथ्य की जांच किए, भड़काऊ कैप्शन और सनसनीखेज दावों के साथ चलाए जा रहे ये प्रोपेगंडा न केवल संस्थानों की छवि बिगाड़ रहे हैं, बल्कि समाज में भी वैमनस्य घोल रहे हैं। यह डिजिटल तानाशाही शैक्षणिक संस्थानों के प्रति जनता का भरोसा तोड़ने का एक कुत्सित प्रयास है, जो अंततः शहर की गरिमा को ही चोट पहुंचा रहा है।

  • Varnan Live Report.

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