‘स्लरी पाइपलाइन’ में पानी के साथ बहकर आएगा लौह अयस्क, उत्पादन को मिलेगी नई रफ्तार
विजय कुमार झा
बोकारो: अब न मालगाड़ी का झंझट, न लोडिंग-अनलोडिंग का इंतजार! बोकारो स्टील प्लांट (BSL) के इतिहास में एक ऐसा क्रांतिकारी बदलाव होने जा रहा है, जो देश के इस्पात क्षेत्र की तस्वीर बदल देगा। महारत्न कंपनी स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (SAIL) देश की सबसे लंबी और अपनी तरह की पहली ‘स्लरी पाइपलाइन’ बिछाने जा रही है। अब पहाड़ों से सीधे पाइप के जरिए बहता हुआ लोहा बोकारो स्टील प्लांट पहुंचेगा और प्रोडक्शन को एक नई रफ्तार देगा।
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इस आधुनिक व्यवस्था को सुनकर कोई भी हैरान रह जाए, क्योंकि अब लोहे को ट्रकों या ट्रेनों में लादने की जरूरत नहीं होगी। इस नई तकनीक के तहत खदानों से प्लांट तक लोहा पानी की तरह बहकर आएगा। सबसे पहले खदान में ही मशीनों के जरिए लौह अयस्क (Iron Ore) को बेहद बारीक पीस दिया जाएगा। इसके बाद इस पिसे हुए बारीक लोहे में पानी मिलाकर एक गाढ़ा घोल तैयार होगा, जिसे तकनीकी भाषा में ‘स्लरी’ कहते हैं। फिर हाई-प्रेशर पंपिंग स्टेशन के जरिए इस घोल को पाइपलाइन में छोड़ दिया जाएगा, जो सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके सीधे बोकारो प्लांट आकर थमेगी।
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ओडिशा-झारखंड के पहाड़ों से बोकारो तक 258 किमी का सफर
यह पाइपलाइन ओडिशा और झारखंड की सबसे समृद्ध खदानों को सीधे बोकारो स्टील प्लांट से जोड़ेगी। सेल की प्रसिद्ध गुआ और बोलानी खदानों से निकाला गया लौह अयस्क पहले ‘जामदा’ नामक मुख्य जंक्शन पर पहुंचेगा। यहीं से 258 किलोमीटर लंबी मुख्य पाइपलाइन की शुरुआत होगी जो सीधे बोकारो तक आएगी। शुरुआत में इस पाइपलाइन के जरिए हर साल लगभग 8.3 मिलियन टन लौह अयस्क बोकारो लाया जाएगा। सेल ने इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह ‘फ्यूचर रेडी’ बनाया है, इसलिए भविष्य में प्लांट का विस्तार होने पर इसी पाइपलाइन से सालाना 16 मिलियन टन लोहा खींचने की क्षमता होगी।

मालगाड़ियों के झंझट और रैक की टेंशन से मिलेगी परमानेंट आजादी
वर्तमान व्यवस्था में खदानों से बोकारो तक लोहा लाने के लिए पूरी तरह मालगाड़ियों पर निर्भर रहना पड़ता है। रेलवे रैक का मिलना, उसमें घंटों लोडिंग होना, फिर लंबा सफर और प्लांट में आकर अनलोडिंग करना—इस पूरी प्रक्रिया में समय और संसाधन दोनों पानी की तरह बहते हैं। कई बार रेलवे की उपलब्धता और समय-सारिणी के कारण सप्लाई भी प्रभावित होती है। लेकिन इस पाइपलाइन के शुरू होते ही यह टेंशन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। पाइपलाइन के जरिए बिना रुके, 24 घंटे निर्बाध और भरोसेमंद तरीके से कच्चे माल की सप्लाई सीधे कारखाने में होती रहेगी।
सुपर इको-फ्रेंडली! पानी की रीसाइक्लिंग और पर्यावरण की सुरक्षा
यह प्रोजेक्ट जितना आर्थिक रूप से फायदेमंद है, पर्यावरण के लिए उतना ही बड़ा वरदान साबित होने वाला है। इस प्रोजेक्ट की सबसे खूबसूरत बात यह है कि लोहे को बोकारो पहुंचाने के बाद, इस्तेमाल किए गए पानी को एक दूसरी समानांतर पाइपलाइन से वापस खदानों में भेज दिया जाएगा ताकि वहां उसका दोबारा इस्तेमाल हो सके। यानी पानी की एक-एक बूंद की बचत होगी। इसके अलावा सड़क और रेल परिवहन पर निर्भरता कम होने से उड़ने वाली धूल, भारी मात्रा में डीजल की खपत और कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी, जो बोकारो को ‘हरित इस्पात’ (Green Steel) उत्पादन का लीडर बनाएगा।
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अगले 30 सालों का मास्टरप्लान, साढ़े तीन साल में होगा साकार
सेल इस मेगा प्रोजेक्ट को भविष्य की आवश्यकताओं और आगामी 30 वर्षों की उपयोगिता को ध्यान में रखकर तैयार कर रहा है। इस विशाल परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए साढ़े तीन साल का लक्ष्य रखा गया है। इसके तहत खदानों में आधुनिक क्रशिंग प्लांट, हाई-टेक पंपिंग स्टेशन और बोकारो प्लांट में इस घोल को रिसीव करने की विशेष व्यवस्थाएं विकसित की जाएंगी। जब यह प्रोजेक्ट पूरा होगा, तो बोकारो स्टील प्लांट आत्मनिर्भरता के एक नए युग में प्रवेश कर चुका होगा, जिससे न सिर्फ प्लांट का विस्तार होगा बल्कि देश के औद्योगिक विकास को भी नई गति मिलेगी।
- Varnan Live Report.





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