तंत्र साधना का चैतन्य पर्व है विजयादशमी : गुरुदेव श्री नंदकिशोर श्रीमाली

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Gurudev Shree NK Shrimali.

युद्ध और संघर्ष जीवन के सत्य हैं और संघर्ष में विजय प्राप्त करना मनुष्य का धर्म है। तंत्र साधना में विजयादशमी पर्व चैतन्य पर्व है। इस दिन विजय-संकल्प लेकर जब साधना संपन्न की जाती है तो साधक की कर्म शक्ति जागृत होती है और वह विजय के पथ पर अग्रसर हो जाता है, विजय उसका वरण करती है। जीवन भौतिक एवं आध्यात्मिक, दोनों ही स्थितियों का संगम है। दोनों क्षेत्र अलग-अलग नहीं हैं। कहीं न कहीं एक दूसरे से अवश्य ही मिलते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों ही स्थितियों में सामंजस्य रखा जाए। वह व्यक्ति सौभाग्यशाली होते हैं, जिन्हें अच्छे मित्र मिलते हैं, अच्छे सहयोगी मिलते हैं और सबसे बड़ी बात उन्हें पूर्ण योग्य गुरु प्राप्त होते हैं, जिनके एक आशीर्वाद से ही, जिनकी कृपा से ही उनके हृदय में हर समय उत्साह बना रहता है। तंत्र और मंत्र का संसार अत्यंत विशाल है और हमारे पूर्वज ऋषि-मुनियों ने इन सभी स्थितियों को देखकर, अपने अनुभव के आधार पर जो ज्ञान ग्रंथों में दिया है, वह अपने आपमें पूर्ण प्रामाणिक एवं सिद्ध हैं। उन साधनाओं को संपन्न करने के लिए हृदय में पूर्ण आस्था आवश्यक है, वहीं गुरु का पूर्ण आशीर्वाद एवं निर्देश भी। यदि आपको साधना का तत्व प्राप्त है और आप अपने कर्म पथ पर अग्रसर हैं तो उन्नति अवश्य प्राप्त होगी। आपका जीवन साधारण जीवन से अलग होगा। इस हेतु आवश्यक है कि आपके जीवन में बाधाएं नहीं रहें, आप जो भी कार्य करना चाहें, वह आपके एक ही बार के प्रयास से पूर्ण हो जाएं, ताकि जीवन में ‘विजय श्री’ आपको प्राप्त हो। प्रत्येक साधना का विशेष समय अवश्य होता है और उस समय साधना संपन्न करने से सफलता अवश्य ही प्राप्त होती है, क्योंकि उस समय ग्रहों की गति, वायुमंडल में चेतना उसी प्रकार की होती है, जो कि आपके मंत्रों के जाप के माध्यम से, आपकी साधना के माध्यम से होती है और आपका कार्य सफल होता है।
पराजय का तात्पर्य है- पीड़ा, हानि, नुकसान, बाधा, विरोध, कार्य में अपूर्णता, अपमान इत्यादि। पराजित होने का तात्पर्य है, आप पर कोई हावी हो रहा है, आप दबकर जी रहे हैं और ऐसा जीवन में होता है। अपराजेय होने का तात्पर्य है कि आपके दोष दूर हो जाएं, आप स्वयं पहचान सकें, अपने संकल्प के अनुसार कार्य कर सकें, दूसरे यदि आपको हानि पहुंचाने का प्रयास करें तो आपको हानि न पहुंचे, जो भी शत्रु आप पर किसी भी प्रकार का तांत्रिक प्रयोग करे, वह उल्टा पड़ जाय, आपको प्रभावित करने की बजाय उल्टा उसे ही हानि दे दे, तभी तो विशेषता है, जीवन का आनन्द है।
पराजय को विजय में बदलना बहुत मुश्किल कार्य नहीं है। आपका जन्म जिस धर्म, जाति, कुल, घर में हुआ है, उसे आप बदल नहीं सकते। उसके बारे में चिन्ता करने से आपके जीवन में विजय प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए सद्गुरुदेव निखिल कहते हैं- तुम भूल जाओ कि किस देश, प्रान्त, जाति, धर्म के हो। इस बात पर विचार करो कि तुम्हारा स्व क्या है? और तुम अपने स्व को सार्थक किस प्रकार से बना सकते हो? जिस दिन इस प्रकार का चिन्तन प्रारम्भ हो जायेगा, वही जीवन की साधना है, जप है, यज्ञ है, तब तुम सफलता की ओर कदम बढ़ाने लगोगे। सफलता का यह राज है कि हम असफलताओं की मलीनता को अपने से चिपकाकर नहीं रखें, उसे उतारकर दूर फेंकें। सद्गुरुदेव कहते हैं कि- हमारे जीवन में किसी एक क्षेत्र में हजार प्रतिशत सुधार की आवश्यकता नहीं है, बल्कि आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन के हजार क्षेत्रों में से प्रत्येक क्षेत्र में एक-एक प्रतिशत सुधार कर लें तो जीवन में हजार प्रतिशत परिवर्तन आ जाता है और सफलता अवश्य मिलती है।
विजय का तात्पर्य है कि जो भी जीवन में कांटे हैं, जो भी जीवन में कंकड़ हैं, जो भी जीवन में न्यूनताएं हैं, जो भी जीवन में शत्रु हैं, उन सब पर विजय पाना और उन सबको समाप्त कर देना। यदि जीवन में विजयी बनना है तो मनुष्य को कुछ ऐसा कार्य करने के लिए निरन्तर प्रेरित होना पड़ेगा, जिससे कि उसका जीवन दूसरों से कुछ अलग बन सके। सही समय पर सही कार्य किये जाने पर उसका फल निश्चय ही शीघ्र प्राप्त होता है और कार्य भी त्वरित गति से सम्पन्न होता है। प्रत्येक पर्व अपने आप में एक विशेष रहस्य लिये हुए रहता है और विजयादशमी पर्व वास्तव में एक तांत्रोक्त साधना सिद्घि पर्व है। तंत्र वह प्रक्रिया है, जिसके द्वारा कार्य को सही रूप में सम्पन्न किया जाय, सही क्रिया की जाय।

विजयादशमी और रावण दहन

शक्ति साधना के 9 दिन नवरात्रि हैं और दसवां दिन विजयादशमी है। मान्यता है कि इस दिन राम ने रावण का वध किया था। इसलिए हर वर्ष विजयादशमी के दिन रावण, मेघनाद, कुंभकरण का पुतला जलाया जाता है। विचारणीय प्रश्न है कि क्यों रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण का पुतला हर साल जलाने की आवश्यकता है? क्या इनका संहार एक बार में नहीं हो सकता है? उत्तर हां और ना! क्योंकि मेघनाद, कुंभकरण और रावण प्रतीक है हमारे अंदर बसने वाली नकारात्मक भावनाओं का। रावण अतिशय अहंकार का द्योतक है, जिसे आम बोलचाल में घमंड कहते हैं, कुंभकरण जड़ता है, वह भाव कि आज करे सो काल कर और काल करे सो परसों एवं मेघनाद अतिशय महत्वाकांक्षा है, ऐसी महत्वाकांक्षा लालच में तब्दील हो जाती है। महत्वाकांक्षा और लालच के बीच एक महीन सी लकीर है, जैसे ही ‘महत्वाकांक्षा’ भय और असुरक्षा से घिर जाती है, वह लालच का रूप ले लेती है। कई बार लालच में हमें सत्य और मिथ्या का भेद नहीं दिखाई देता है। मेघनाद ने हनुमान को ब्रह्म-पाश में क्या बांध लिया, उसे लगा कि वह हनुमान से अधिक शक्तिशाली है और यही भ्रम उसके अंत का कारण बना।
रामायण-नायक राम मयार्दा पुरुषोत्तम हैं। उनके चरित्र में कहीं भी आवेग नहीं है और रावण आवेश को ही समर्पित है। उसके लिए तो ‘जो मैंने सोचा, वही सही है’। क्योंकि कमोवेश यह भाव हम सबके मन में बार-बार उठते हैं। इसीलिए विजयादशमी को प्रतीक रूप में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण हर साल जला दिए जाते हैं। क्योंकि, वास्तविक विजयदशमी का अर्थ आत्मिक स्तर पर परिवर्तन है। जब संकीर्णता उदारता में, क्रूरता करुणा में, विचारहीव कुतर्क सृजनात्मक आलोचना में और पूर्वाग्रह प्रौढ़ता में बदल जाए, तब जीवन में वास्तविक विजयादशमी है।

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