इस्पात मंत्रालय से हटने व NBCC में विलय के बाद HSCL का अस्तित्व संकट में

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विजय कुमार झा

बोकारो : वर्ष 1964 में स्थापित सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी हिन्दुस्तान स्टीलवर्क्स कंस्ट्रक्शन लिमिटेड (एचएससीएल) आज अपनी बबार्दी पर आंसू बहा रही है। विगत 25 मई, 2016 को केन्द्र सरकार ने इस्पात मंत्रालय के अधीनस्थ कार्यरत एचएससीएल को शहरी विकास मंत्रालय के उपक्रम एनबीसीसी (नैशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कारपोरेशन लिमिटेड) के हवाले सौंप दिया। मसलन, एचएससीएल के ऊपर एनबीसीसी का आधिपत्य स्थापित हो गया। इसके बाद से एचएससीएल की हालत लगातार खराब होती जा रही है। यहां ‘माल महाराज का, मिर्जा खेले होली’ जैसी कहावत बिल्कुल चरितार्थ हो रही है, क्योंकि मुनाफा कमाती है एचएससीएल और ऐश करते हैं एनबीसीसी के अधिकारी।

लूटपाट के कारण कंगाल हुई इकाइयां

दरअसल, भारत के आर्थिक विकास में अहम योगदान देने के उद्देश्य से वर्ष 1964 में एचएससीएल की स्थापना की गयी। इस कम्पनी ने बोकारो स्टील प्लांट, भिलाई स्टील प्लांट, राउरकेला स्टील प्लांट आदि के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण सहयोग दिया। बोकारो में एचएससीएल की सबसे बड़ी इकाई खड़ी हुई और यह कम्पनी सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात कारखानों के रख-रखाव के साथ-साथ कई अन्य क्षेत्रों में निरन्तर कार्यरत रही। परन्तु दिसम्बर 1998 में इसका ग्राफ नीचे गिरने लगा। कर्मचारियों के मासिक वेतन भुगतान पर भी आफत आ गयी। धीरे-धीरे छह-छह माह के बाद वेतन भुगतान होने लगे। जब कर्मचारियों के 36 माह का वेतन रुक गया तो फरवरी 2005 में रामाधार झा कम्पनी की बोकारो इकाई के प्रभार में पदस्थापित हुए। मुख्यालय की सहायता से उन्होंने 36 माह के बकाये वेतन का भुगतान करवाया। कम्पनी की हालत सुधारने में तत्कालीन सीएमडी पार्थसारथी की भी अहम भूमिका रही। फिर 2009 में मलय चटर्जी कम्पनी के सीएमडी बने और उन्होंने भी इसे आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जुलाई 2013 तक कर्मचारियों का वेतन भुगतान नियमित रूप से होता रहा। चार जून 2013 को सीएमडी के पद पर भादुरी चटर्जी पदस्थापित हुए और उनके आने के बाद कम्पनी धीरे-धीरे अवसान की ओर चल पड़ी। उनके बिठाये गये लोगों द्वारा भयंकर लूटपाट मचाने के कारण एचएससीएल की सभी इकाइयां कंगाल होने लगीं। कम्पनी की बोकारो इकाई में जुलाई 2013 से दिसम्बर 2016 तक यूनिट इंचार्ज के रूप में के के बंदोपाध्याय पदस्थापित रहे, जिन्हें दुगार्पुर स्टील प्लांट से सेवानिवृत्त होने के बाद यहां लाया गया था। उन्होंने सेवानिवृत्त लोगों को अनावश्यक यहां जीएम व डीजीएम के पदों पर बहाल कर उन पर करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिये। जो काम यहां सिर्फ एक जीएम से चल रहा था, वहां पांच-पांच लोगों को बैठाकर उन्हें लूट का साझेदार बना दिया। लिहाजा कम्पनी की हालत बेहद खराब हो गयी और अंतत: इसका विलय एनबीसीसी में कर दिया गया।

एचएससीएल के साथ हुई नाइंसाफी

एनबीसीसी के साथ एचएससीएल का विलय होना काफी दुर्भाग्यपूर्ण माना जा रहा है। आज बोकारो सहित भिलाई, राइरकेला, दुगार्पुर, विशाखापत्तनम, दुबरी, बर्नपुर, जहां-जहां भी इस्पात कारखाने हैं, हर जगह एचएससीएल की अपनी इकाइयां हैं। अपने आलीशान कार्यालय हैं, अपने संसाधन हैं। अगर सिर्फ बोकारो को देखें तो यहां कम्पनी के पास अरबों रुपये मूल्य के ऐसे उपकरण मौजूद हैं, जिनका उपयोग बड़े-बड़े कामों में होता है। लेकिन ये मशीनें बेकार पड़ी हैं और इन्हें जंग खा रही है। कम्पनी की बोकारो इकाई विगत पांच-सात वर्षों से लगातार मुनाफे में है। हाल ही में कम्पनी ने लगभग 35 करोड़ का मुनाफा कमाया है। परन्तु इसकी कमाई से एनबीसीसी ने 43 करोड़ की सम्पत्ति खरीदी है। यह एचएससीएल के साथ नाइंसाफी नहीं तो और क्या है?

BPSCL ने भी दिया धोखा

जानकारों की मानें तो डीवीसी और स्टील अथॉरिटी आॅफ इंडिया लि. (सेल) की संयुक्त इकाई बोकारो पावर सप्लाई कम्पनी लि. (बीपीएससीएल) ने भी एचएससीएल को बड़ा धोखा दिया है। बोकारो में ऐश पौण्ड की सफाई का काम वर्ष 1992 से ही एचएससीएल कर रही थी। इस काम से कम्पनी को अपने कर्मचारियों के वेतन भुगतान और रख-रखाव में बड़ी मदद मिलती थी। परन्तु हाल के दिनों में बीपीएससीएल प्रबंधन ने ऐश पौण्ड की सफाई का काम एचएससीएल से छीनकर प्राइवेट पार्टी को दे दिया। स्पष्ट है कि चूंकि एचएससीएल एक सरकारी कम्पनी है और इससे किसी का व्यक्तिगत हित नहीं साधा जा सकता। लिहाजा कमीशनखोरी के चक्कर में इसके साथ धोखा किया गया है।

जानकारों की मानें तो डीवीसी और स्टील अथॉरिटी आॅफ इंडिया लि. (सेल) की संयुक्त इकाई बोकारो पावर सप्लाई कम्पनी लि. (बीपीएससीएल) ने भी एचएससीएल को बड़ा धोखा दिया है। बोकारो में ऐश पौण्ड की सफाई का काम वर्ष 1992 से ही एचएससीएल कर रही थी। इस काम से कम्पनी को अपने कर्मचारियों के वेतन भुगतान और रख-रखाव में बड़ी मदद मिलती थी। परन्तु हाल के दिनों में बीपीएससीएल प्रबंधन ने ऐश पौण्ड की सफाई का काम एचएससीएल से छीनकर प्राइवेट पार्टी को दे दिया। स्पष्ट है कि चूंकि एचएससीएल एक सरकारी कम्पनी है और इससे किसी का व्यक्तिगत हित नहीं साधा जा सकता। लिहाजा कमीशनखोरी के चक्कर में इसके साथ धोखा किया गया है।

इस्पात मंत्रालय से जोड़ने की मांग

एचएससीएल से सम्बद्ध कतिपय श्रमिक संगठनों ने इस कम्पनी को शहरी विकास मंत्रालय से हटाकर पूर्व की तरह इस्पात मंत्रालय से जोड़ने की मांग की है। एचएससीएल के श्रमिक नेता विजय कुमार ने कहा कि अगर इस कम्पनी को बचाना है तो केन्द्र सरकार बिना देर किये इसे इस्पात मंत्रालय के अधीन वापस सौंप दे। उन्होंने कहा कि चूंकि एचएससीएल इस्पात क्षेत्र में काम करने वाली एक दक्ष कम्पनी है, इसलिए शहरी विकास मंत्रालय से इसे जोड़े रखना इसके साथ सरासर अन्याय है। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इसे ‘मेकॉन’ के साथ जोड़ना चाहते थे, लेकिन कम्पनी के कोलकाता स्थित मुख्यालय में बैठे टीएमसी यूनियन से जुड़े और एनबीसीसी के समर्थक कुछ स्वार्थी लोगों ने इसका विरोध किया था, जिसके कारण इसे एनबीसीसी के साथ समायोजित किया गया। परन्तु अगर इसके अस्तित्व को बचाये रखना है तो इसे पुन: इस्पात मंत्रालय से जोड़ना ही होगा। उन्होंने कहा कि अगर सार्वजनिक क्षेत्र के इस्पात उद्योगों से इसे 40 प्रतिशत काम भी मिले तो उनके रख-रखाव भी सुचारु रहेंगे और कम्पनी को लाभ अर्जन भी होगा। इसके लिए उन्होंने इस्पात मंत्रालय से भी पहल करने का अनुरोध किया।

बकाया भुगतान का आंदोलन जारी

एचएससीएल स्वेच्छिक सेवानिवृत्त कर्मचारी संघ द्वारा अपने बकाये का भुगतान करने हेतु आंदोलन का सिलसिला लगातार जारी है। स्वेच्छिक सेवानिवृत्त कर्मचारी इस बात से आहत हैं कि जब केन्द्र सरकार ने कम्पनी के स्वैच्छिक सेवानिवृत्त कर्मचारियों तथा अन्य बकाये के भुगतान के लिए 110 करोड़ रुपये का आर्थिक पैकेज दिया तो इसके बावजूद उनके बकाये का भुगतान आज तक क्यों नहीं हो सका है? उन्होंने बताया कि बोकारो में आज भी लगभग तीन हजार से अधिक सेवानिवृत्त कर्मचारियों का बकाया भुगतान रुका हुआ है।

  • Varnan Live.

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