अपने ही घर में पराया बनी हिन्दी

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चित्र साभार- गूगल इमेजेज

घर के मुखिया को अगर अपने घर में ही उपेक्षा झेलनी पड़े तो यह बहुत बड़ा दुर्भाग्य और विडंबना ही माना जायेगा। हमारी राजभाषा मानी जाने वाली हिन्दी आज कुछ इसी दौर से गुजर रही है। अपने ही घर में यह अपनों के रहमो-करम पर है। हिन्दुस्तान और हिन्दी का अटूट नाता है। लेकिन, दुर्भाग्यवश प्रकृति से उदार ग्रहणशील, सहिष्णु और भारत की राष्ट्रीय चेतना की संवाहिका हिन्दी आज अत्याधुनिकता की होड़ में अपने ही घर में परायेपन का दंश झेलने को विवश है।

हर वर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस पर कुछ हिंदीप्रेमियों के द्वारा याद तो रखा जाता है, लेकिन दिन-प्रतिदिन अंग्रेजी का आकर्षण हिंदी को कहीं न कहीं से दबाता या तोड़ता-मोड़ता जा रहा है। हिन्दी दिवस पर हम हर साल मात्र उसी तरह से हिन्दीमय होते हैं, जिस तरह से 15 अगस्त या 26 जनवरी को हममें देशभक्ति का उफान आता है। इसके पीछे बहुत बड़ा कारण यह है कि हिंदीभाषी सदियों से हीनता के शिकार होते चले जा रहे हैं। आज हमारे देश में पुरानी बहुत सारी विद्यायें विलुप्त हो चुकी हैं। अगर उसका कुछ अंश मिलता है तो सीधे-साधे शब्दों में समझ में नहीं आता, क्योंकि किसी भी संस्कृति, विद्या एक युग से दूसरे युग तक भाषा पहुंचाने या संवहन का कार्य करती है।

आज लोगों की मानसिकता इस कदर गिर चुकी है कि हिन्दी का प्रयोग करना खुद उन्हें हीनता का तथाकथित आभास करा रहा है। दूसरे शब्दों में कहें तो आज का शैक्षणिक परिवेश उसे बहुत हद तक ऐसा सोचने पर विवश कर रहा है। वर्तमान में हिन्दी की जो दुर्गति हो रही है, उसके लिए केवल एक पक्ष जिम्मेदार नहीं है। भारत की वर्तमान शिक्षा पद्धति में आज बालकों को पूर्व प्राथमिक से ही अंग्रेजी के गीत रटाये जाते हैं। यदि घर में बालक बिना अर्थ जाने ही आने वाले अतिथियों को अंग्रेजी में कविता आदि सुना दें, तो माता-पिता का मस्तक गर्व से ऊंचा हो जाता है। मेहमान भी बच्चों को अंग्रेजी ही सिखाने की नसीहत दिये चलते बनते हैं। आधुनिकता के नाम पर बच्चों पर अंग्रेजी थोपी जा रही है। उसे एक और एक ग्यारह समझ नहीं आएगा, लेकिन वो वन प्लस वन इलेवन जल्दी से समझ लेगा। हमारी भाषा को सबसे अधिक प्रभावित कर रही है फिल्में और टीवी, जो कहने को हिन्दी फिल्में होती है, लेकिन उसके शीर्षक से लेकर गीतों तक में अंग्रेजी का बोलबाला रहता है।

हमारे देश में कई सौ साल गुलाम रहने के बाद अलग-अलग भाषाओं और संस्कृति से प्रभावित होने के कारण हम खुद की भाषा से, खुद की पहचान से कमजोर होते जा रहे हैं। फलस्वरूप आज हिंदी की प्रभाविता दिन-प्रतिदिन कमजोर होती जा रही है। कहने को तो बहुत से संगठन हिन्दी के विकास में प्रयास करने का दावा तो करते हैं, परंतु उनके कार्यालयीन कार्य में, उनकी बोलचाल में हिन्दी के बजाय अंग्रेजी की ही बहुतायत हच्ती है। हम हिंदी भाषियों के दिमाग में हीनता इस कदर बढ़ गयी है कि हम अपनी चीजों की कमजोरी या अपरिपक्व समझते हैं और हम हीनता के शिकार हिंदी भाषी हिंदी को और हीन करते जा रहे हैं। नये युग में हिंदी का सम्मोहन तभी होगा, जब हम हिंदी के साथ अपने को गर्वित महसूस कर सकते हैं। जैसे हिंदी दिन-प्रतिदिन हीन हो रही है, वैसे-वैसे अपनी संस्कृति, सभ्यता या हम भी हीन होते जा रहे हैं। वास्तव में हिन्दी पूरे भारत की संपर्क भाषा है, इसका संरक्षण व संवर्द्धन आवश्यक है। हिंदी सिर्फ हमारी भाषा ही नहीं, अपितु हमारी पहचान है और इसे खोकर हम अपनी पहचान खो रहे हैं। समय रहते हिंदी भाषा के संरक्षण के लिए सभी को प्रयास करने की आवश्यकता है। इसके लिये जनमानस में एक वैचारिक अच्च्र मानसिक क्रांति लानी होगी। हमें खुद अपनी पहचान के प्रति जागरुक होना होगा, नहीं तो वह दिन दूर नहीं, जब हिन्दुस्तान में ही हिन्दी का अस्तित्व अवशेष मात्र बनकर रह जायेगा।

1949 में हिन्दी दिवस की शुरुआत

भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर, 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिन्दी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी। इसी महत्त्वपूर्ण निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है।

प्रस्तुति : विजय

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