प्रबंधन ने की सभी से सहयोग की अपील, कहा- बोकारो इस्पात संयंत्र की प्रगति ही बोकारो के विकास का आधार

दीपक झा
बोकारो।
Steel Authority of India Limited (SAIL) की प्रमुख इकाई Bokaro Steel Plant (BSL) के विस्तारीकरण और बोकारो की औद्योगिक प्रगति के नए द्वार खुलते ही पुनः एक नए आंदोलन की आहट से विकास की नई संभावनाओं पर कुठाराघात होने का खतरा मंडराने लगा है। आंदोलन की इस नई सुगबुगाहट ने सेल प्रबंधन के साथ-साथ बोकारो की उन्नति की चाह रखने वालों की भी चिंता बढ़ा दी है।
दरअसल, प्रतिकूल परिस्थितियों और कठिन चुनौतियों का सामना करने के एक साल बाद बोकारो इस्पात संयंत्र एक बार पुनः विस्तारीकरण के नए और सुखद मुहाने पर पहुंच सका है। संयंत्र के विस्तारीकरण हेतु लगभग 20,000 करोड़ रुपये का निवेश रोजगार, आधारभूत संरचना और औद्योगिक प्रगति के नए द्वार खोलने जा रहा है। बोकारो स्टील प्लांट के विस्तारीकरण से सम्बंधित कई टेंडर निकल चुके हैं और कई निकलने वाले हैं। इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, बल्कि विस्थापित युवाओं के लिए भी रोजगार और आत्मनिर्भरता के बेहतर अवसर सृजित होंगे। यह निवेश निश्चय ही पूरे क्षेत्र के लिए अभूतपूर्व विकास का आधार बन सकता है। लेकिन, प्रगति के नए द्वार खुलते ही एक बार फिर आंदोलनों की आहट ने विकास की उस उम्मीद पर ग्रहण लगाने की चिंता बढ़ा दी है।


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दरअसल, पिछले वर्ष 3 अप्रैल 2025 को बोकारो इस्पात संयंत्र के प्रशासनिक भवन के समक्ष हुए आंदोलन और इस दौरान हुई हिंसक घटनाओं के कारण लगभग 20,000 करोड़ रुपए के निवेश से संयंत्र के विस्तारीकरण की परियोजना खटाई में पड़ गई थी और बोकारो के भविष्य पर खतरे के घने कोहरे छा गए थे। लिहाजा, केंद्रीय इस्पात मंत्रालय द्वारा बोकारो इस्पात संयंत्र के विस्तारीकरण की स्वीकृत यह परियोजना सेल की दूसरी इकाई में शिफ्ट किए जाने पर न सिर्फ मंथन शुरू हुआ था, बल्कि इसे अमल में लाने पर भी सहमति बन चुकी थी। लेकिन फिर कई सांसदों और जन-प्रतिनिधियों की पहल पर लगभग एक साल बाद इस ब्राउनफील्ड विस्तार परियोजना को बोकारो में ही मूर्त रूप देना तय हुआ और अब इसे धरातल उतारने की दिशा में कार्य प्रारंभ हो चुके हैं।


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गत वर्ष आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले प्रेम प्रसाद की माता गोमती देवी ने अपनी मांगों के पूरा न होने पर आगामी 06 मार्च 2026 से अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने का ऐलान किया है। उन्होंने इस संबंध में सतर्कता अधिकारी, बोकारो इस्पात संयंत्र को विधिवत नोटिस सौंपते हुए स्पष्ट किया है कि 5 अप्रैल 2025 को जिला प्रशासन और प्रबंधन के साथ हुई मध्यस्थता के बावजूद एक साल बीत जाने पर भी उन्हें न्याय नहीं मिला है। गोमती देवी का आरोप है कि उनके पुत्र की मृत्यु के बाद उपायुक्त बोकारो की अध्यक्षता में, जिसमें सांसद, विधायक और बीएसएल के निदेशक प्रभारी भी मौजूद थे, कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए थे। समझौते के अनुसार, शहीद के परिजनों को 15 दिनों के भीतर नियोजन देना, पार्क निर्माण हेतु 20 डिसमिल जमीन उपलब्ध कराना और विस्थापित अप्रेंटिस बच्चों के नियोजन की प्रक्रिया 3 महीने के भीतर पूरी करनी थी। गोमती देवी का आरोप है कि प्रशासन और संयंत्र प्रबंधन द्वारा इन शर्तों पर केवल बरगलाया जा रहा है, जिसके कारण विवश होकर उन्हें विस्थापित अप्रेंटिस संघ और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर दोबारा आंदोलन की राह चुननी पड़ रही है। इस संभावित धरने की संपूर्ण जवाबदेही उन्होंने जिला प्रशासन और बोकारो इस्पात संयंत्र पर तय की है।


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उल्लेखनीय है कि बोकारो इस्पात संयंत्र केवल एक औद्योगिक प्रतिष्ठान नहीं, बल्कि पूरे बोकारो स्टील सिटी और आसपास के क्षेत्र की अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है। यह संयंत्र 20 हजार से अधिक लोगों को प्रत्यक्ष तथा बड़ी संख्या में अन्य लोगों को अप्रत्यक्ष रोजगार उपलब्ध कराता है। छोटे व्यवसायियों की आजीविका, शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सामाजिक व्यवस्थाएं और क्षेत्रीय विकास – सभी इस संयंत्र की स्थिरता और सतत उत्पादन पर निर्भर हैं।

गौरतलब है कि बोकारो इस्पात संयंत्र एक तरफ जहां इस शहर की लाइफलाइन है, वहीं दूसरी तरफ चंद लोगों की सियासत ने इसके लाइफ को ही संकट में डालने का प्रयास किया। एक बार नहीं, अनेक बार। दशकों से बीएसएल में विस्थापितों और बेरोजगारों की नाम की राजनीति होती आ रही है। प्रबंधन की मानें, तो जो योग्य एवं अर्हताधारी विस्थापित थे, उन्हें बहुत पहले ही लाभान्वित किया जा चुका है, उनके गांवों में भी परिक्षेत्रीय विकास की योजनाओं के तहत कई काम किए जा चुके हैं। लेकिन, आजतक विस्थापित आंदोलन के नाम पर विकास-कार्य को प्रभावित किया जा रहा है। दावों की मानें, तो इस छद्म लड़ाई में कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनका न तो विस्थापितों के हित से कोई नाता है और न ही उनके संगठन से, उन्हें बस केवल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकनी और खुद के विकास से ताल्लुक है। और, सच्चाई भी यह है कि विस्थापितों के नाम की राजनीति करने वाले दर्जनों नेता ऐसे हैं, जो साइकिल से एसयूवी तक का क्रांतिकारी सफर तय कर चुके हैं, लेकिन उनका साथ देने वाले कुछ लोग आज भी जस की तस हालात में हैं। सूत्र बताते हैं कि गत वर्ष के कथित विस्थापित आंदोलन में घुसे कुछ तत्वों ने जिस प्रकार का आतंक फैलाया था, शहर में आगजनी, राह चलते निर्दोष लोगों की निर्मम पिटाई की गई थी और प्लांट के उत्पादन को ठप किए जाने आदि घटनाओं के कारण बोकारो में भोपाल गैस कांड जैसी बड़ी त्रासदी को आमंत्रित किया गया था। शहर की असुरक्षा और अराजकता की स्थिति के कारण बीएसएल के विस्तारीकरण की उक्त परियोजना खटाई में पड़ गई थी, लेकिन काफी प्रयासों के बाद यह डूबती नैया बचाई जा सकी है। शहर के प्रबुद्धजनों का कहना है कि अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है। अब भी अगर सभी मिलकर इस विकास की यात्रा में साथ देंगे, तो यकीनन बीएसएल विकास के नए कीर्तिमान रचेगा और बोकारो देश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय पटल पर औद्योगिक क्रांति की एक नई इबारत रचने में कामयाब होगा।

आधिकारिक सूत्रों की मानें तो पूर्व में हुए अवरोध और हिंसक विरोध से उत्पादन, वित्तीय प्रदर्शन और विस्तार योजनाएं गंभीर रूप से प्रभावित हुई थीं, जिससे विकास की रफ्तार थम गई थी। इस वित्त वर्ष पहले के 9 महीनों में प्लांट का वित्तीय प्रदर्शन भी उतना आशाजनक नहीं रहा है। हालांकि, हाल के महीनों में इसने वापस रफ़्तार पकड़ी है, इसलिए ऐसे समय में, जब बोकारो में परिस्थितियां पुनः सामान्य हो रही हैं और विकास की रफ्तार फिर से पटरी पर लौट रही है, यहां के आद्योगिक-सामाजिक वातावरण में किसी भी समूह द्वारा अस्थिरता पैदा करना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। क्योंकि, किसी भी प्रकार का आंदोलन यदि संयंत्र के संचालन को बाधित करता है, तो उसका प्रभाव केवल प्रबंधन या कंपनी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि एक बड़े जन समुदाय को प्रभावित करता है। ऐसी घटनाएं बोकारो को आगे बढ़ाने के बजाय वर्षों पीछे धकेल देती हैं। बड़ी कठिनाइयों और अथक प्रयासों के बाद ही निवेश और औद्योगिक विश्वास को पुनः स्थापित किया जा सका है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि इस संयंत्र की भूमिका केवल स्थानीय ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां निर्मित इस्पात देश की प्रमुख आधारभूत परियोजनाओं से लेकर भारतीय नौसेना के युद्धपोतों तक में उपयोग होता है, जो राष्ट्र की आर्थिक और सामरिक शक्ति को सुदृढ़ करता है। पिछले एक वर्ष में ही नौसेना के अनेक नए जहाजों के निर्माण में बोकारो के इस्पात की आपूर्ति की गई है।

बोकारो इस्पात प्रबंधन का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण और रचनात्मक विरोध सभी का अधिकार है, परंतु यह भी उतना ही आवश्यक है कि विरोध का स्वरूप ऐसा हो, जिससे औद्योगिक माहौल, निवेश और रोजगार प्रभावित न हों। संवाद, सहयोग और आपसी समझ ही स्थायी समाधान का मार्ग हैं, टकराव नहीं। संयंत्र प्रबंधन ने भी क्षेत्र की जनता, खासकर विस्थापित समूहों और युवाओं के कई मुद्दों पर सकारात्मक पहल करते हुए उनके कल्याण के लिए कई कदम जैसे- अप्रेंटिस युवाओं को संवेदकों द्वारा संयंत्र के कार्य में प्राथमिकता में नियोजन उपलब्ध कराना, विस्थापित ठेकेदारों को वरीयता के आधार पर कार्य उपलब्ध कराना इत्यादि उठाए है। प्लांट के विस्तारीकरण से ऐसे कल्याणकारी पहलों में और बढ़ोतरी होने की प्रबल संभावना है।

प्रबंधन ने शहर के विकास में सहयोग की भावनात्मक अपील करते हुए कहा कि बोकारो की तरक्की, बोकारो स्टील प्लांट की तरक्की से सीधे जुड़ी है। इसलिए सभी हितधारकों और पक्षों से यह अपेक्षा है कि संयंत्र और शहर की शांति, सुरक्षा और निरंतरता बनाए रखने में उनका सहयोग रहे, ताकि बोकारो और इस क्षेत्र की प्रगति जारी रहे।

  • Varnan Live Report.

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