सुपर 30 और बाढ़ का बखेड़ा

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इन दिनों देश में किसी बात के लिए बवाल हो जाता है। कभी किसी नेता के वक्तव्य पर बवाल, तो कभी चुनावी नतीजों पर। नरेंद्र मोदी भारी बहुमत से चुनाव जीत गए तो बिहार के एक युवक ने उनकी जीत की खुशी में अपने सीने पर चाकू से “मोदी” गोद लिया। 

चुनाव की सरगर्मी अभी थमी भी नहीं थी, कि बिहार में बाढ़ की त्रासदी आ गयी। अब संयोग देखिये कि ऐसे कठिन वक्त पर हृतिक रोशन ने बिना सोचे-समझे अपनी फ़िल्म “सुपर 30” रिलीज कर दी | सुनने में आया है कि फ़िल्म बहुत बढ़िया है।

फिल्म रिलीज होते ही खबर छपी, ‘एक तरफ जहाँ बिहार के लाखों लोग बाढ़ के चपेट में हैं, वहीं दूसरी तरफ, सुशील कुमार मोदीजी “सुपर 30” फ़िल्म देखते हुए कैमरे पर पकड़े गए’ | एक नया बवाल शुरू हो गया|

हमें सिर्फ ये समझ नहीं आया कि “सुपर 30” जैसी साफ-सुथरी और प्रेरक फ़िल्म देखने में रंगे-हाथों पकड़े जाने जैसी क्या बात है । पकड़े जाने का भय तो हमें रहता था जब हम कुछ मित्र स्कूल छोड़ कर, सुबह 10:30 बजे “इंग्लिश” शो देखने जाते थे |

हमें सिर्फ ये समझ नहीं आया कि “सुपर 30” जैसी साफ-सुथरी और प्रेरक फ़िल्म देखने में रंगे-हाथों पकड़े जाने जैसी क्या बात है । पकड़े जाने का भय तो हमें रहता था जब हम कुछ मित्रों के साथ स्कूल छोड़ कर, सुबह 10:30 बजे का “इंग्लिश” शो देखने जाते थे |

हमारी नीयत साफ थी| एकदम सुलझा हुआ तर्क भी था, ‘भाई, यदि आप अंग्रेजों को इंग्लिश बोलते नहीं देखेंगे-सुनेंगे तो आपकी इंग्लिश कैसे सुधरेगी ?’

लेकिन हमारे टीचर और माँ-बाप के विचार हमसे भिन्न थे | उन्हें लगता था कि अँग्रेजी फ़िल्मों में अश्लीलता होती है| खास कर, उन फ़िल्मों में जो सिनेमाघरों में सुबह 11:00 बजे के पहले दिखाई जाती हैं। उन्हें इस बात का इल्म तक नहीं था कि सब का चहेता दूरदर्शन भी शुक्रवार को देर रात इंगलिश फिल्में दिखा पूरे देश का भाषाज्ञान सुधार रहा है। और-तो-और बच्चे, सोमवार को स्कूल में late-night फिल्म पर ग्रूप डिस्कशन (group discussion) भी करते हैं। साफ नीयत और अकाट्य तर्क के बावजूद हमें पकड़े जाने का भय सताता था, क्योंकि हमारे टीचर या पिता दोनों ही बात-चीत कर मतभेद सुलझाने में कम और एक-आधा थप्पड़ चलाकर मामला सैटल करने में ज्यादा यकीन करते थे|

ऐसा नहीं कि हमने इजाजत लेकर फिल्में नहीं देखीं, लेकिन इजाजत मिलती थी “मासूम”  जैसी फिल्म के लिए| अब ऐसी फिल्में कई वर्षों में एक बनती थीं| एकबारगी, बोकारो में संगम फिल्म आई तो हमने अपनी माँ से पूछा,  ‘राज कपूर – राजेन्द्र कुमार की हिट फिल्म है| 60 के दशक में बनी है तो साफ-सुथरी ही होगी | हम देख आयें क्या ? ‘

माताजी की भृकुटी तनी, तुरंत बोली, ‘बिलकुल नहीं ! इस सिनेमा में हीरोइन swimming costume पहन कर नदी में तैर रही है, और राज कपूर एकदम बेहूदा अंदाज में पेड़ पर बैठ कर उसे निहारते हुए  गाना गा रहा है ‘ | ऐसी फ़िल्में देखोगे तो संस्कार खराब होंगे| तुम भी मवालियों जैसी हरकत करोगे।

हमारे मन में आया कि कहूँ, ‘नदी में नहाने में आखिर बुराई क्या है और swimming costume तो बनाया ही इसी लिए गया है की लोग उसे पहन सरलता से तैर सकें ।बेचारे राज कपूर साहब ! उनका क्या दोष?  सारा दोष तो मुकेश जी  का था जो  ‘बोल-राधा-बोल संगम होगा की नहीं’ गा रहे थे | बेचारे राजकपूर तो सिर्फ़ पेड़ पर बैठ होंठ हिला रहे थे |’

खैर, हमने ये बात सिर्फ सोची, कही नहीं। हमें पता था की पिताजी जितना तो नहीं, लेकिन माँ को भी ‘कनैठी’ और ‘थप्पड़’ की उपयोगिता का पूरा ज्ञान है| जरूरत होने पर यदा-कदा, माँ भी को भी इनके इस्तेमाल से परहेज़ नहीं था|  

हमने सोचा फिजूल में क्या बहस करना। बेहतर है, इंगलिश सुधारने पर ही ध्यान दूँ | दोस्तों के साथ अगले शनिवार 10:00 बजे का इंग्लिश कोर्स कर आया देवी सिनेमाघर में। बचपन का कौतूहल  अँग्रेजी के कई कोर्स  करने के बाद भी खत्म नहीं हुआ |  मसलन, वर्षों बाद कानपुर में कॉलेज के दौरान, फिर  से ‘संगम’ फिल्म लगी | दोस्तों को जबर्दस्ती ले गया फिल्म देखने| चार घंटे के शो के बाद सारे मित्र गुस्से में मुझे पीटने पर उतारू थे | ‘ तुम भी न ! इससे कम कपड़े तो हीरोइनों ने दयावान, परिंदा, सागर, बाजीगर और न जाने कितनी फिल्मों पहने और निर्माताओं के पैसे-बचाए | चलो सबके टिकट के 20-20 रुपये वापस करो और सबके खाने का बिल भी तुम भरोगे’ |

वक्त बीतने के साथ ऐसा लगा कि  देश मे लोगों  की बौद्धिक सहिष्णुता बढ़ी है ।  NetFlix और Amazon Prime Video मे ऐसे-ऐसे शो आ रहे हैं  जिन्हे देख  Hollywood के निर्माता नतमस्तक हो जाएँ।

समाज कि तमाम विसंगतियों को बहुत परिपक्वता से दिखा रहे हैं ।  भाषा की शालीनता की तो बात ही न करें । इतनी शालीन भाषा तो अनुकरण के योग्य है | कल्पना के लिए  कुछ नहीं छोड़ते निर्माता -निर्देशक । जबरदस्त लोकप्रिय हैं ये शो। इनके लिए कोई सेंसर बोर्ड नहीं है | 

हमें अपने समय से पहले पैदा हो जाने पर बड़ा क्रोध आता है | अब देखिये, कहाँ तो हम छुप-छुप कर  इंग्लिश सीखते रहे और कामचलाऊ इंग्लिश पर ही अटक गए |कहाँ ये आजकल के बच्चे घर बैठे रात-रात भर इंग्लिश का क्रैश-कोर्स कर रहे हैं और धड़ल्ले से इंग्लिश बोल रहे हैं |

अख़बारनवीसों! सुशील कुमार मोदी जी को कम से कम  चैन से “सुपर 30” तो देख लेने दो | किसी अच्छी फिल्म को टैक्स-फ्री करने से ज़्यादा लोग देख-पाते हैं, सामाजिक जागरूकता बढ़ती है| यदि इसका निर्णय करने के लिए उन्होंने फिल्म देख ली तो ठीक ही तो किया|  यदि मनोरंजन के लिए भी देखा तो क्या गलत है?

बिहार के शीर्षस्थ प्रशासक और मंत्री यदि इस फिल्म से कुछ प्रेरणा लेकर शिक्षा व्यवस्था सुधारेंगे तभी तो इनमें से कोई विद्यार्थी इंजीनियर बन कर कोशी, बागमती, कमला, नारायनी, महानंदा-नदियों से हर साल आने वाली बाढ़ की समस्या का दूरगामी निदान करेगा|

इस विवाद को लेकर मुझे सुशील कुमार मोदी जी से विशेष सहानुभूति है!

Acknowledgements and image sources (साभार )
Super 30 Poster : By Source, Fair use, https://en.wikipedia.org/w/index.php?curid=60926054
Sushil Kumar Modi picture : http://sushilmodi.in/

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